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Mahishasura Mardini Stotram: महिषासुर मर्दिनि स्तोत्र नवरात्रि में करें पाठ, मां दूर करेंगी हर संकट

Mahishasura Mardini Stotram: महिषासुर मर्दिनि स्तोत्र नवरात्रि में करें पाठ, मां दूर करेंगी हर संकट
Aigiri nandini lyrics in hindi, mahishasura mardini stotra lyrics aigiri nandini nandhitha medhini powerful mantra lyrics: चैत्र नवरात्रि 2025 में महिषासुर मर्दिनि स्तोत्र का पाठ करें। मां दुर्गा की पूजा विधि से करें शुरुआत, फिर अयि गिरिनंदिनि पढ़ें। यह शक्तिशाली स्तोत्र हर परेशानी दूर करता है। मां की कृपा से मिलेगा आशीर्वाद और शांति.
Mahishasura Mardini Stotram lyrics in Hindi: चैत्र नवरात्रि का पवित्र समय शुरू हो चुका है, और यह मां दुर्गा की भक्ति में डूबने का सबसे खास मौका है। मान्यता है कि इन दिनों मां धरती पर अपने भक्तों के बीच आती हैं और उनकी सच्ची श्रद्धा से प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। अगर आप भी मां की कृपा से अपने जीवन के दुखों को अलविदा कहना चाहते हैं, तो नवरात्रि में महिषासुर मर्दिनि स्तोत्र का पाठ जरूर करें। यह शक्तिशाली स्तोत्र न सिर्फ आपकी परेशानियों को दूर करता है, बल्कि मन को शांति और आत्मविश्वास भी देता है। तो चलिए, इसके महत्व और पाठ की सही विधि को आसान भाषा में समझते हैं।

Mahishasura Mardini Stotram: क्यों खास है महिषासुर मर्दिनि स्तोत्र?

महिषासुर मर्दिनि स्तोत्र मां दुर्गा की महिमा का गुणगान करने वाला एक ऐसा भक्ति भरा गीत है, जो हर सुनने और पढ़ने वाले के दिल को छू जाता है। कहते हैं कि इसका पाठ करने से मां अपने भक्तों के सारे कष्ट हर लेती हैं। यह स्तोत्र मां की उस शक्ति को याद दिलाता है, जिससे उन्होंने महिषासुर जैसे दानव का अंत किया था। चाहे घर में कलह हो, आर्थिक तंगी हो या मन की बेचैनी, इस पाठ से हर मुश्किल आसान हो सकती है। नवरात्रि में इसे पढ़ने से मां का आशीर्वाद कई गुना बढ़ जाता है।

Mahishasura Mardini Stotram : Aigiri Nandini

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

पाठ करने की सही विधि

इस स्तोत्र का लाभ लेने के लिए सही तरीके से पूजा करना जरूरी है। सबसे पहले सुबह स्नान कर साफ कपड़े पहनें और मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठें। मां को फूल, धूप और दीप अर्पित करें। इसके बाद शांत मन से महिषासुर मर्दिनि स्तोत्र का पाठ शुरू करें। इसे एकाग्रता के साथ पढ़ें, ताकि हर शब्द आपके दिल तक पहुंचे। अगर आप इसे याद नहीं कर सकते, तो किताब या मोबाइल से भी पढ़ सकते हैं। यह जानकारी मोबाइल यूजर्स के लिए खास तौर पर आसान बनाई गई है, ताकि आप कहीं भी हों, मां की भक्ति में डूब सकें।

स्तोत्र का एक झलक: अयि गिरिनंदिनि

महिषासुर मर्दिनि स्तोत्र की शुरुआत होती है - "अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते..."। यह पंक्ति मां की महिमा को बयां करती है और उनके शक्तिशाली रूप को दर्शाती है। हर छंद में मां की वीरता, करुणा और सुंदरता का बखान है। जैसे-जैसे आप इसे पढ़ते हैं, मन में एक अलग ही ऊर्जा जागती है। पूरा स्तोत्र 21 छंदों में है, और हर बार "जय जय हे महिषासुरमर्दिनि" कहकर मां को नमन किया जाता है। यह न सिर्फ भक्ति बढ़ाता है, बल्कि आत्मा को भी शुद्ध करता है।

आपकी जिंदगी में लाएगा बदलाव

नवरात्रि में इस स्तोत्र को पढ़ने से नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मकता का संचार होता है। चाहे आप इसे अकेले पढ़ें या परिवार के साथ, मां की कृपा हर किसी पर बरसती है। यह लेख आपके लिए इसलिए लिखा गया है ताकि आप इस पवित्र पाठ का महत्व समझें और इसे आसानी से अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकें। तो इस नवरात्रि मां को याद करें, उनका आशीर्वाद लें और अपने जीवन को खुशहाल बनाएं।

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