दिल्ली की ‘फूल वालों की सैर’ हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहज़ीब की अनोखी मिसाल है।

इस उत्सव में दरगाह पर फूलों की चादर और योगमाया मंदिर में फूलों के पंखे चढ़ाए जाते हैं।

‘फूल वालों की सैर’ की शुरुआत 19वीं सदी में मुगल बादशाह अकबर शाह द्वितीय ने की थी।

राजकुमार मिर्जा जहांगीर को ब्रिटिश अफसर पर गोली चलाने के बाद देश से निर्वासित किया गया था।

जहांगीर की मां की मन्नत पूरी होने पर दरगाह पर फूलों की चादर चढ़ाने से इस परंपरा की शुरुआत हुई।

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने इस सांस्कृतिक उत्सव पर रोक लगा दी थी।

आजादी के बाद कुछ समय तक यह परंपरा भुला दी गई, लेकिन दिल्लीवालों के दिलों में जिंदा रही।

1960-61 में नेहरू के प्रयासों से यह त्योहार फिर से शुरू हुआ और डीडीए के सहयोग से मनाया जाने लगा।

इस साल ‘फूल वालों की सैर’ अनुमति और जमीन विवाद के कारण संकट में है।

‘फूल वालों की सैर’ आज भी दिल्ली की साझा संस्कृति और भाईचारे की जीवंत पहचान है।