कन्या संक्रांति 2026: सूर्य देव ने 17 सितंबर 2026, गुरुवार की सुबह 07 बजकर 58 मिनट पर सिंह राशि की अपनी यात्रा पूरी कर बुध के स्वामित्व वाली कन्या राशि में प्रवेश कर लिया है। ज्योतिष और पंचांग गणना के अनुसार सूर्य के इस राशि परिवर्तन को कन्या संक्रांति कहा जाता है। उत्तर भारत के कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और प्रयागराज सहित तमाम प्रमुख तीर्थ घाटों पर श्रद्धालु सूर्य उपासना, पवित्र स्नान और दान-पुण्य के अनुष्ठानों में जुटे हैं।
इस संक्रांति का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि इस वर्ष यह दो अत्यंत फलदायी नक्षत्र योगों रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के साये में आई है। शास्त्रों के अनुसार संक्रांति काल में किया गया जल तर्पण और दान व्यक्ति को आरोग्य और मान-सम्मान दिलाता है।
कन्या संक्रांति 2026 का महापुण्यकाल और पुण्यकाल कब तक है?
सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करते ही संक्रांति का महापुण्यकाल सुबह 07 बजकर 58 मिनट पर प्रारंभ हो गया था। यह महापुण्यकाल 2 घंटे 3 मिनट की अवधि के लिए सुबह 10 बजकर 01 मिनट तक रहा। इस अवधि को तंत्र-मंत्र साधना, विशेष अर्घ्य और संकल्प पूर्वक दान के लिए सर्वोच्च माना गया है।
जो श्रद्धालु व्यस्तता अथवा अन्य कारणों से महापुण्यकाल में स्नान-दान नहीं कर सके, उनके लिए पुण्यकाल दोपहर 02 बजकर 31 मिनट तक मान्य है। कुल 6 घंटे 33 मिनट लंबे इस पुण्यकाल के भीतर किए गए सभी सात्विक कर्म पूर्ण फल प्रदान करते हैं।
रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का दुर्लभ संयोग
कन्या संक्रांति पर इस बार रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग एक साथ सक्रिय हैं। ज्योतिषीय सिद्धांतों के अनुसार सर्वार्थ सिद्धि योग में शुरू किए गए शुभ संकल्प निर्विघ्न पूरे होते हैं।
रवि योग सूर्य के नकारात्मक प्रभावों को समाप्त कर साधक की कुंडली में आत्मबल, तेज और प्रशासनिक प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। इन दो योगों की मौजूदगी के चलते इस दिन का धार्मिक महत्व सामान्य संक्रांतियों से कहीं अधिक बढ़ गया है।
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कन्या संक्रांति पर मनोकामना पूर्ति के लिए 4 जरूरी कार्य
जीवन में सुख, समृद्धि और आत्मिक शांति के लिए कन्या संक्रांति पर चार विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
स्नान के पश्चात तांबे के लोटे में शुद्ध जल लेकर उसमें रोली, लाल चंदन, लाल फूल और थोड़ा सा गुड़ मिलाएं। दोनों हाथों को सिर से ऊपर उठाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान भास्कर को अर्घ्य दें।
अर्घ्य देने के बाद लाल चंदन की माला से सूर्य देव के बीज मंत्रों का जाप करना चाहिए। साधक “ॐ घृणिः सूर्याय नमः” अथवा “ॐ सूर्याय नमः” का कम से कम 108 बार जाप करें।
सूर्य की प्रसन्नता के लिए अपनी सामर्थ्य के मुताबिक तांबे के बर्तन, साबुत गेहूं, गुड़, लाल वस्त्र और लाल चंदन का दान किसी सुपात्र या जरूरतमंद व्यक्ति को दें।
जिन लोगों के माता-पिता अथवा पूर्वज दिवंगत हो चुके हैं, वे दोपहर से पहले शुद्ध जल में काले तिल और कुशा डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के नाम तर्पण करें। संक्रांति पर किया गया तर्पण पितृदोष की शांति के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
सूर्य पूजा का जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव
सनातन परंपरा में सूर्य प्रत्यक्ष देवता माने जाते हैं जो प्रकृति को ऊर्जा और गति देते हैं। कन्या संक्रांति पर सूर्य की आराधना करने से शारीरिक ऊर्जा का संचार होता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। सभी बारह राशियों के जातक इस दिन सूर्य नमस्कार और दान-पुण्य के माध्यम से सूर्य के अनुकूल प्रभाव हासिल कर सकते हैं। #KanyaSankranti #SuryaGochar #Astrology












