हिसार के खासा महाजन गांव में जाति के आधार पर श्मशान घाट बांटने और बोर्ड लगाने पर मानवाधिकार आयोग ने सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने डीसी को 15 दिन में रिपोर्ट देने को कहा है।
हिसार . हरियाणा के हिसार जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जो सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली है। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं लेकिन आज भी कुछ जगहों पर जातिगत भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इंसान के मरने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ रही हैं।
मामला हिसार के गांव खासा महाजन का है जहां श्मशान घाट को ही जातियों के आधार पर बांट दिया गया है। इस गंभीर मामले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी एनएचआरसी ने कड़ा रुख अपनाया है और जिला प्रशासन को जमकर फटकार लगाई है।
साइन बोर्ड लगाकर बांटा श्मशान
गांव खासा महाजन में जातिगत भेदभाव की हदें पार करते हुए श्मशान घाट के अलग अलग हिस्से कर दिए गए। सामान्य वर्ग और अनुसूचित जाति समुदाय के लिए न केवल अलग अलग जगह निर्धारित की गई बल्कि वहां बाकायदा साइन बोर्ड भी लगा दिए गए ताकि यह पता चल सके कि किस जाति का व्यक्ति कहां अंतिम संस्कार करेगा।
यह पूरा कृत्य खुलेआम संविधान की धज्जियां उड़ाने जैसा है। इस मामले की शिकायत बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व सदस्य सुशील वर्मा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दर्ज करवाई थी।
आयोग ने माना गंभीर अपराध
शिकायत मिलने के बाद आयोग ने मामले की गंभीरता को समझा। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो की पीठ ने इसे मानवाधिकारों का प्रथम दृष्टया उल्लंघन माना है।
आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि श्मशान घाट जैसी सार्वजनिक जगह पर जाति के आधार पर बंटवारा करना गरिमा और समानता के अधिकार पर चोट है। आयोग ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 12 के तहत इस मामले में संज्ञान लिया है।
संविधान के इन अनुच्छेदों का हुआ उल्लंघन
आयोग ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि यह मामला भारतीय संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है।
अनुच्छेद 14: जो समानता का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 15: जो धर्म, वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है।
अनुच्छेद 17: जो अस्पृश्यता यानी छुआछूत का अंत करता है। आयोग का कहना है कि श्मशान बांटना सामाजिक बहिष्कार और छुआछूत को बढ़ावा देने जैसा ही है जिसे लोकतांत्रिक देश में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
डीसी को मिला 15 दिन का समय
एनएचआरसी ने हिसार के उपायुक्त को सख्त निर्देश जारी किए हैं। आयोग ने जिला प्रशासन से पूछा है कि आखिर किसकी शह पर गांव में ऐसे बोर्ड लगाए गए और अब तक इस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
आयोग ने डीसी को मामले की निष्पक्ष जांच करने और 15 दिन के भीतर विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे भेदभावपूर्ण बोर्ड तुरंत हटाए जाएं और दोषियों पर कार्रवाई हो।
सामाजिक स्तर पर गहरा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायत और स्थानीय प्रशासन की नाक के नीचे इस तरह का भेदभाव होना चिंताजनक है। जब अंतिम संस्कार जैसी दुखद घड़ी में भी समाज बंटा हुआ नजर आता है तो यह सामाजिक समरसता के लिए खतरा है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में कितनी जल्दी और क्या कार्रवाई करता है ताकि समाज में एक सही संदेश जा सके।











