अंबाला कैंट की प्रमुख सामाजिक संस्था अग्रवाल सभा में लंबे समय से अटके चुनाव आखिर तय हो गए हैं। करीब साढ़े चार साल बाद 4 जनवरी को अग्रवाल धर्मशाला में वोटिंग और उसी दिन परिणाम घोषित किया जाएगा।
कुल 1450 से अधिक सदस्य इस प्रक्रिया में भाग लेंगे, इसलिए इसे कैंट के सबसे बड़े सामुदायिक चुनावों में माना जा रहा है।
चुनाव कैसे होंगे
चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने के लिए अंबाला छावनी की तहसीलदार को पीठासीन अधिकारी नियुक्त किया गया है। प्रशासन और सभा समिति ने तैयारी शुरू कर दी है और आधिकारिक अधिसूचना भी जारी कर दी गई है।
50 कोलेजियम बनाए गए हैं, जो नेतृत्व चुनने की जिम्मेदारी संभालेंगे।
हर कोलेजियम में करीब 30 सदस्य शामिल होंगे।
चुनाव प्रधान, उपप्रधान, महासचिव, कोषाध्यक्ष जैसे पदों पर होगा।
नए पदाधिकारी बाद में अपनी कार्यकारिणी का विस्तार करेंगे।
एक स्थानीय सामाजिक विश्लेषक का कहना है कि “कैंट जैसे शहर में जहां व्यापारिक बिरादरी का नेटवर्क मजबूत है, वहां इस तरह की संस्थाओं के चुनाव स्थानीय सामाजिक नेतृत्व को दिशा देते हैं।”
दो गुट आमने सामने
अधिसूचना जारी होते ही चुनावी समीकरण बनना शुरू हो गए हैं। सदस्य और व्यापारी अनिल अग्रवाल के अनुसार संभावना है कि दो प्रमुख ग्रुप मैदान में उतरेंगे—
राकेश कंसल ग्रुप
सुभाष गोयल ग्रुप
दोनों गुट सदस्य बैठकों और समर्थन जुटाने की शुरुआत कर चुके हैं।
समाजसेवी बताते हैं कि “इन समूहों की सक्रियता से मतदान में उत्साह बढ़ता है और संस्था के भीतर लोकतांत्रिक संवाद मजबूत होता है।”
क्यों अटकी थी प्रक्रिया
करीब साढ़े चार साल से चुनाव नहीं हो पा रहे थे।
सदस्यों का आरोप था कि संस्था का संचालन पारदर्शी नहीं था और धर्मशालाओं के प्रबंधन का हिसाब नहीं दिया जा रहा था।
फुटबॉल चौक अग्रवाल धर्मशाला,
अंबा देवी धर्मशाला
काली बाड़ी संपत्ति
ये तीनों प्रमुख संस्थागत संपत्तियां हैं जिनके सही रखरखाव और उपयोग पर चिंताएं जताई गई थीं।
सदस्यों के अनुसार एजीएम में बहुत कम लोग आते थे और वित्तीय स्थिति स्पष्ट नहीं थी।
अनिल अग्रवाल का कहना है,
“संस्था को चलाने के लिए चुने हुए पदाधिकारियों की जरूरत होती है। हमने जिला सोसायटी रजिस्ट्रार के सामने यह मुद्दा उठाया क्योंकि नियमों के अनुसार एडहॉक कमेटी का कार्यकाल सिर्फ छह महीने का होता है।”
दूसरी ओर क्या कहती है समिति
एडहॉक कमेटी के कन्वीनर सुभाष गोयल इन आरोपों से इनकार करते हैं।
उनका कहना है कि वे भी चाहते थे कि चुनाव हों ताकि संस्था सुचारू रूप से आगे बढ़ सके।
स्थानीय विशेषज्ञों का मानना है कि विवाद खत्म होकर चुनाव तय होना संपत्ति प्रबंधन, धार्मिक स्थानों की स्थिति और सामुदायिक विकास के लिए सकारात्मक कदम माना जा सकता है।
इस चुनाव का महत्व
संस्था के पास तीन महत्वपूर्ण संपत्तियां और मजबूत सामाजिक आधार है।
नया कार्यकारिणी धर्मशालाओं के रखरखाव, सामाजिक कार्यक्रमों और सामुदायिक निवेश से जुड़े फैसले करेगा।
स्थानीय व्यापारिक और सामाजिक समुदाय के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा और नेतृत्व निर्धारण की प्रक्रिया है।
सिविल मामलों में अनुभव रखने वाले एक वकील ने बताया कि
“जब किसी सामाजिक संस्था के चुनाव समय पर नहीं होते, तो पारदर्शिता और विश्वास कम हो जाता है। यह चुनाव विश्वास बहाली के लिए अहम है।”
आगे क्या
4 जनवरी की वोटिंग के बाद नया नेतृत्व कार्यभार संभालेगा।
उम्मीद है कि इससे संपत्ति प्रबंधन, सामुदायिक कार्यक्रमों और आर्थिक पारदर्शिता पर अधिक ध्यान दिया जाएगा।












