डिजिटल डेस्क, भिवानी : विजेंद्र सिंह ने यूजीसी के नए इक्विटी नियमों की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि छात्रों को जाति के आधार पर बांटना गलत है और सरकार को यह फैसला वापस लेना चाहिए।
भारत के स्टार मुक्केबाज और ओलंपिक पदक विजेता विजेंद्र सिंह ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के नए फरमान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किए गए ‘इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ पर कड़ी आपत्ति जताई है। विजेंद्र का कहना है कि क्लासरूम में बैठे युवा देश का भविष्य होते हैं और उन्हें जातिगत श्रेणियों में बांटना देश के लिए घातक साबित हो सकता है।
विजेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया पर क्या लिखा
विजेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी बात रखते हुए यूजीसी से इन नियमों को वापस लेने की अपील की है। उनका तर्क है कि शिक्षा का असल मकसद समान अवसर प्रदान करना होना चाहिए न कि छात्रों के बीच दीवारें खड़ी करना। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा कि युवाओं को वर्गों में बांटने वाला यह फैसला चिंताजनक है। उनके अनुसार शिक्षण संस्थान ज्ञान का मंदिर हैं और वहां जातिगत आधार पर वर्गीकरण से छात्रों की मानसिकता पर बुरा असर पड़ेगा।
क्या है यूजीसी का नया नियम 2026
यूजीसी ने इसी महीने 13 जनवरी 2026 को नए नियम नोटिफाई किए हैं। इन नियमों का पूरा नाम ‘हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस में इक्विटी को बढ़ावा देने के नियम 2026’ है। इसने 2012 में बने पुराने नियमों की जगह ली है।
नए बदलावों के तहत कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में अब सख्त निगरानी तंत्र होगा।
हर संस्थान में एक ‘इक्विटी कमेटी’ बनाई जाएगी।
भेदभाव रोकने के लिए ‘इक्विटी स्क्वॉड’ का गठन होगा।
छात्रों की शिकायतों के लिए स्पेशल हेल्पलाइन शुरू होगी।
क्यों हो रहा है इतना विरोध
विवाद की मुख्य वजह इन नियमों की भाषा और परिभाषा है। आलोचकों और विजेंद्र सिंह जैसे लोगों का मानना है कि इन नियमों में जातिगत भेदभाव की जो परिभाषा दी गई है वह मुख्य रूप से एससी एसटी और ओबीसी छात्रों पर केंद्रित है।
सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि क्या भेदभाव केवल कुछ विशेष वर्गों के साथ ही होता है। लोगों का कहना है कि यह नियम सामान्य वर्ग यानी जनरल कैटेगरी के छात्रों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा कर सकता है। इसे समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने वाला कदम बताया जा रहा है।
शिक्षा जगत से जुड़े जानकारों का मानना है कि भेदभाव मुक्त परिसर बनाना एक अच्छी पहल है लेकिन इसे लागू करने का तरीका संतुलित होना चाहिए। वरिष्ठ शिक्षाविदों के अनुसार अगर नियम केवल एक पक्ष को ध्यान में रखकर बनाए जाएंगे तो दूसरे पक्ष में असंतोष पनपना स्वाभाविक है।
उनका सुझाव है कि एंटी डिस्क्रिमिनेशन सेल का काम हर छात्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो। फिलहाल विजेंद्र सिंह के बयान के बाद यह मुद्दा और गरमा गया है। अब देखना होगा कि शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी इस विरोध पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।












