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Guru Tegh Bahadur cremation sites: गुरु तेग बहादुर के दो पवित्र स्थलों जहां हुआ था शीश और धड़ का अंतिम संस्कार!

On: November 25, 2025 6:23 AM
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Guru Tegh Bahadur cremation sites: गुरु तेग बहादुर के दो पवित्र स्थलों जहां हुआ था शीश और धड़ का अंतिम संस्कार!
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Guru Tegh Bahadur cremation sites: दिल्ली के तख्त पर उस समय क्रूर मुगल शासक औरंगज़ेब शासन कर रहा था। उसकी अत्याचारों की नीतियों ने हिंदुओं और खासकर कश्मीरी पंडितों का जीवन नरक बना दिया था। जबरन धर्म परिवर्तन करवाया जाता था, और इंकार करने पर लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता था।

इन्हीं अत्याचारों से परेशान करीब 500 कश्मीरी पंडित पंडित कृपा राम के नेतृत्व में आनंदपुर पहुंचे और गुरु तेग बहादुर से सहायता की प्रार्थना की। कहा जाता है कि अमरनाथ में भगवान शिव से प्रार्थना करने के बाद एक पंडित को स्वप्न में संकेत मिला कि नवें गुरु ही उनके रक्षक होंगे। इसके बाद जो हुआ, उसने गुरु तेग बहादुर के त्याग को अमर कर दिया।

गुरु तेग बहादुर का बचपन Guru Tegh Bahadur cremation sites

गुरु तेग बहादुर का जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था। बचपन में उनका नाम त्याग मल था। वह छठे सिख गुरु गुरु हरगोविंद के सबसे छोटे पुत्र थे, जो सोढ़ी वंश की खत्री जाति से थे। उनके भाइयों में बाबा गुरदित्ता, सूरज मल, अनी राय, अटल राय और बहन बीबी वीरो शामिल थे।

करतारपुर की लड़ाई में अद्भुत साहस दिखाने पर पिता गुरु हरगोविंद ने त्याग मल को नया नाम दिया — तेग बहादुर, यानी तलवार का धनी।

सिख परंपरा के अनुसार उन्हें छोटी उम्र से ही तीरंदाजी, घुड़सवारी, वेद, उपनिषद और पुराणों की शिक्षा दी गई। 3 फरवरी 1632 को उनका विवाह हुआ। गुरु हरगोविंद के निधन के बाद तेग बहादुर कुछ समय बकाला में अपनी मां और पत्नी के साथ रहे।

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जब आठवें गुरु गुरु हर किशन चेचक से बीमार पड़े, तो उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के बारे में केवल इतना कहा — “बाबा बकाला”।

कैसे चुने गए 9वें गुरु तेग बहादुर?

गुरु हर किशन के संकेत के बाद कई लोग स्वयं को गुरु घोषित करते हुए बकाला पहुंच गए। इसी समय अमीर व्यापारी माखन शाह लबाना भी अपनी मन्नत पूरी करने 500 स्वर्ण मुद्राएं चढ़ाने आया।

वह हर स्वयंभू गुरु को मात्र दो सिक्के देता रहा, ताकि असली गुरु का पता लगे। कोई भी उसे नहीं पहचान पाया, लेकिन जब वह तेग बहादुर के पास पहुंचा, तो उन्होंने कहा —
“माखन शाह, तुम्हारा वादा पांच सौ स्वर्ण मुद्राओं का था।”

तभी माखन शाह छत पर चढ़कर जोर से चिल्लाया — “गुरु लाधो रे!”

इसके बाद अगस्त 1664 में संगत ने तेग बहादुर को 9वें गुरु के रूप में स्वीकार किया।

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कश्मीरी पंडितों की पुकार पर निकले गुरु तेग बहादुर

कश्मीरी पंडितों की गुहार सुनकर गुरु तेग बहादुर तुरंत यात्रा पर निकले, लेकिन रोपड़ में उन्हें गिरफ्तार कर सरहिंद की जेल में डाल दिया गया। चार महीने बाद उन्हें दिल्ली लाया गया, जहां औरंगज़ेब ने धार्मिक चमत्कार दिखाने या इस्लाम स्वीकार करने का आदेश दिया।

गुरु के इंकार करने पर उनके तीन साथियों — भाई मति दास, भाई दयाल दास, भाई सती दास — को अमानवीय तरीके से शहीद किया गया।

आखिर में, 1675 में चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया।

गुरु के सिर का अंतिम संस्कार — आनंदपुर साहिब

गुरु तेग बहादुर के शरीर रहित शीश को भाई जैता (बाद में भाई जीवन सिंह) दिल्ली से चोरी-छिपे आनंदपुर साहिब ले आए।
वहीं पर गुरु का अंतिम संस्कार किया गया और आज इसी स्थान पर शीश गंज गुरुद्वारा, आनंदपुर साहिब स्थित है।
दिल्ली के चांदनी चौक में जहां शहादत हुई थी, वहां भी शीश गंज गुरुद्वारा दिल्ली है।

गुरु के धड़ का अंतिम संस्कार — रकाब गंज

गुरु के धड़ को भाई लखी शाह बंजारा और उनके पुत्र ने रात के अंधेरे में अपने घर ले जाकर छिपाया।
औरंगज़ेब के आतंक के कारण खुलकर संस्कार संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने घर में आग लगाकर गुरु के धड़ का अंतिम संस्कार किया।

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आज वहीं रकाब गंज गुरुद्वारा, नई दिल्ली में स्थित है—जहां कभी रकाब गंज गांव हुआ करता था।

अमित गुप्ता

पत्रकारिता में पिछले 30 वर्षों का अनुभव। दैनिक भास्कर, अमर उजाला में पत्रकारिता की। दैनिक भास्कर में 20 वर्षों तक काम किया। अब अपने न्यूज पोर्टल हरियाणा न्यूज पोस्ट (Haryananewspost.com) पर बतौर संपादक काम कर रहा हूं। खबरों के साथ साथ हरियाणा के हर विषय पर पकड़। हरियाणा के खेत खलियान से राजनीति की चौपाल तक, हरियाणा सरकार की नीतियों के साथ साथ शहर के विकास की बात हो या हर विषयवस्तु पर लिखने की धाकड़ पकड़। म्हारा हरियाणा, जय हरियाणा।

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