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वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा; जानिए क्यों की जाती है बरगद के पेड़ की पूजा और क्या है इसका महत्व

On: मई 15, 2026 2:19 अपराह्न
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वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा; जानिए क्यों की जाती है बरगद के पेड़ की पूजा और क्या है इसका महत्व
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चंडीगढ़, 15 मई (हरियाणा न्यूज पोस्ट)। उत्तर भारत सहित पूरे देश में सुहागिन महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत बेहद खास और आस्था का प्रतीक माना जाता है। हर साल ज्येष्ठ मास में आने वाले इस पावन पर्व पर शादीशुदा महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए पूरे दिन उपवास रखती हैं। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली-NCR के क्षेत्रों में इस दिन महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर बरगद के पेड़ की पूजा करने निकलती हैं। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह दांपत्य जीवन में आपसी प्रेम, निष्ठा और अटूट विश्वास की याद दिलाता है।

यमराज से पति के प्राण वापस लाई थीं माता सावित्री

इस ऐतिहासिक व्रत का सीधा संबंध पौराणिक काल की परम पतिव्रता माता सावित्री से जुड़ा हुआ है। भारतीय संस्कृति में सावित्री को एक आदर्श और साहसी पत्नी का दर्जा दिया गया है, जिन्होंने अपने अटूट प्रेम और बुद्धिमत्ता से इतिहास बदल दिया। पौराणिक कथाओं के मुताबिक सावित्री मद्र देश के राजा अश्वपति की परम तेजस्वी पुत्री थीं। जब वह विवाह योग्य हुईं, तो उन्होंने निर्वासित राजा के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। हालांकि देवर्षि नारद ने पहले ही सचेत कर दिया था कि सत्यवान अल्पायु हैं, लेकिन सावित्री अपने फैसले पर अडिग रहीं।

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बुद्धिमानी और चतुराई से जीता यमराज का दिल

विवाह के बाद तय समय पर जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काट रहे थे, अचानक तबीयत बिगड़ने से वह बेहोश होकर गिर पड़े। उसी समय मृत्यु के देवता यमराज सत्यवान के प्राण लेने धरती पर पहुंचे। यमराज जैसे ही सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, सावित्री बिना डरे उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। रास्ते में सावित्री ने अपनी विद्वत्ता, विनम्रता और धर्मग्रंथों के तर्कों से यमराज को गहरे प्रभावित कर दिया। सावित्री के साहस को देखकर यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा, लेकिन शर्त रखी कि वह पति के प्राण नहीं मांग सकतीं।

ऐसे मिला सत्यवान को दोबारा जीवन

सावित्री ने अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय देते हुए यमराज से अपने सास-ससुर के राज्य की वापसी, आंखों की रोशनी और अंत में सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांग लिया। यमराज ने बिना सोचे-समझे ‘तथास्तु’ कह दिया, जिसके बाद वह धर्मसंकट में पड़ गए क्योंकि एक पतिव्रता नारी पति के बिना माता नहीं बन सकती थी। अपने ही वरदान के जाल में फंसकर यमराज को हार माननी पड़ी और उन्होंने सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए। सावित्री की यह सूझबूझ आज के समय में भी परिवारों को संकट से उबारने और कठिन समय में धैर्य रखने की बड़ी सीख देती है।

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बरगद के पेड़ की पूजा का वैज्ञानिक और धार्मिक रहस्य

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जंगल में जिस स्थान पर सत्यवान को दोबारा जीवन मिला था, वहां एक विशाल वट यानी बरगद का वृक्ष मौजूद था। इसी वजह से इस उपवास का नाम ‘वट सावित्री व्रत’ पड़ा और इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा अनिवार्य हो गई। सनातन परंपरा में बरगद के पेड़ को अमरता, लंबी आयु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। महिलाएं इस दिन बरगद के तने पर सूत का धागा लपेटकर अपने पति की दीर्घायु की मन्नत मांगती हैं।

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मौलिक गुप्ता

मौलिक गुप्ता एक प्रतिभाशाली और अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 8 वर्षों से एंटरटेनमेंट और ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर आकर्षक और ताज़ा खबरें लिख रहे हैं। उनकी स्टोरीज़ बॉलीवुड, टीवी, सेलिब्रिटी अपडेट्स, वायरल ट्रेंड्स और सोशल मीडिया की हलचल को कवर करती हैं, जो पाठकों को मनोरंजन की दुनिया से जोड़े रखती हैं। मौलिक का लेखन शैली जीवंत, रोचक और समयानुकूल है, जो युवा और विविध पाठकों को आकर्षित करता है। वे Haryananewspost.com न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय हैं, जहाँ उनके लेख ट्रेंडिंग विषयों पर गहरी अंतर्दृष्टि और मनोरंजक जानकारी प्रदान करते हैं।

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