Controversy genome-edited rice, Controversy over genome-edited rice varieties, what is the danger, why is there an uproar: भारत में खेती के भविष्य को बदलने का दावा करने वाली जीनोम-एडिटेड चावल की दो नई किस्में चर्चा में हैं, लेकिन ये उत्साह के साथ-साथ विवाद भी लाई हैं।
रविवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने डीआरआर धान 100 (कमला) और पूसा डीएसटी राइस-1 को देश को समर्पित किया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) का दावा है कि ये किस्में 30% ज्यादा उपज दे सकती हैं। लेकिन कोऑलिएशन फॉर जीएम-फ्री इंडिया जैसे संगठन इनके खिलाफ खड़े हो गए हैं।
उनका कहना है कि ये किस्में मनुष्यों और पर्यावरण के लिए खतरनाक हो सकती हैं। आइए, इस मुद्दे की गहराई में उतरकर समझते हैं कि आखिर विवाद की जड़ क्या है।
जीनोम-एडिटेड चावल: वरदान या खतरा? Controversy genome-edited rice
जीनोम-एडिटिंग एक ऐसी तकनीक है, जो फसलों के डीएनए में बदलाव कर उनकी उपज, सूखा प्रतिरोध और गुणवत्ता बढ़ाने का दावा करती है। डीआरआर धान 100 और पूसा डीएसटी राइस-1 को आईसीएआर ने ऐसी ही तकनीक से विकसित किया है। सरकार का कहना है कि ये किस्में किसानों के लिए गेम-चेंजर साबित होंगी।
लेकिन कोऑलिएशन फॉर जीएम-फ्री इंडिया ने इन फसलों को ‘अवैध’ और ‘असुरक्षित’ करार दिया है। संगठन का आरोप है कि इन बीजों में इंसानों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की क्षमता है। सोमवार को जारी एक बयान में संगठन ने दावा किया कि इन किस्मों को बिना पर्याप्त सुरक्षा जांच के लॉन्च किया गया, जो कॉर्पोरेट लॉबी के दबाव में लिया गया गैरकानूनी कदम है।
सुरक्षा जांच का सवाल
कोऑलिएशन का कहना है कि जीनोम-एडिटेड चावल की किस्मों को साइट-डायरेक्टेड न्यूक्लियस 1 और 2 (एसडीएन-1 और एसडीएन-2) तकनीक से बनाया गया है, जिसे भारत में रेगुलेटरी टेस्टिंग से मुक्त कर दिया गया है। संगठन के मुताबिक, अगर इन फसलों की सही जांच की जाए, तो इनके खतरे सामने आ जाएंगे।
संगठन ने यह भी बताया कि इन किस्मों को बनाने की प्रक्रिया की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। बिना फ्री ट्रायल्स और पारदर्शी जांच के इन्हें लॉन्च करना गलत है। संगठन ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर इन किस्मों को वापस नहीं लिया गया, तो इसके खिलाफ कड़ा विरोध होगा।
आईसीएआर का जवाब
विवाद बढ़ने के बाद आईसीएआर ने इन आरोपों को खारिज किया है। आईसीएआर के सदस्य वेणुगोपाल बदरवाड़ा ने कहा कि यह विरोध ‘सुर्खियां बटोरने’ की कोशिश है। उनका कहना है कि इन किस्मों को जलवायु या पर्यावरण के लिए नुकसानदायक साबित करने का कोई सबूत नहीं है।
हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि सूखा, लवणता या गर्मी जैसे तनावों के लिए इन फसलों की लचीलापन जांचने में कम से कम 5-7 साल की कठिन टेस्टिंग जरूरी है। यह बयान सवाल उठाता है कि क्या इन फसलों को इतनी जल्दी लॉन्च करना सही था?
किसानों और उपभोक्ताओं के लिए सलाह
यह विवाद किसानों और आम लोगों के लिए कई सवाल छोड़ गया है। क्या जीनोम-एडिटेड फसलें वाकई सुरक्षित हैं? क्या ये ज्यादा उपज का वादा पूरा करेंगी? अगर आप किसान हैं, तो इन नई किस्मों को अपनाने से पहले विशेषज्ञों से सलाह लें और इनके फायदे-नुकसान को समझें।
अगर आप उपभोक्ता हैं, तो अपने भोजन की सुरक्षा को लेकर जागरूक रहें। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई भी जल्द ही कोई बड़ा फैसला दे सकती है। तब तक, सतर्क रहना जरूरी है।
समाज के सामने चुनौती
जीनोम-एडिटेड फसलों का यह विवाद हमें खेती, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के बीच संतुलन की जरूरत को दर्शाता है। एक तरफ ज्यादा उपज और खाद्य सुरक्षा का वादा है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर आशंकाएं हैं। सरकार, वैज्ञानिकों और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि नई तकनीकें किसानों और उपभोक्ताओं के हित में हों। क्या आप इस मुद्दे पर अपनी राय रखना चाहेंगे? अपने विचार साझा करें और इस बहस का हिस्सा बनें।











