Guar Crop Disease: ग्वार खरीफ के मौसम की एक अहम नकदी फसल है, जो किसानों के लिए कमाई का बड़ा जरिया है। इसकी हरी फलियों को सब्जी के तौर पर खाया जा सकता है, जबकि हरा चारा पशुओं के लिए और हरी खाद के लिए भी इस्तेमाल होता है। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू), हिसार के कुलपति प्रो. बीआर काम्बोज बताते हैं कि अगर समय पर ग्वार की फसल में खरपतवार, सिंचाई, कीट और बीमारियों का प्रबंधन किया जाए, तो उत्पादन को काफी बढ़ाया जा सकता है। फलियां बनने के समय अगर बारिश न हो, तो हल्की सिंचाई जरूरी है। वहीं, ज्यादा बारिश से फसल की बढ़वार तेज हो सकती है।
बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट फसल का दुश्मन
अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग के मुताबिक, ग्वार की बिजाई के 50-60 दिन बाद बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस बीमारी में पत्तों पर भूरे और काले रंग के गीले धब्बे दिखते हैं। नमी वाले मौसम में ये धब्बे आपस में मिलकर बड़े हो जाते हैं और बाद में तनों व फलियों तक फैल जाते हैं। इससे प्रभावित पौधे सूखने लगते हैं। इस बीमारी से बचाव के लिए शुरुआत में ही स्ट्रेप्टोसाइक्लीन (30 ग्राम प्रति एकड़) और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (400 ग्राम प्रति एकड़) को 200 लीटर पानी में मिलाकर 15-20 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें।
कीट और खरपतवार से सावधान
कभी-कभी ग्वार की फसल में तेला कीट का हमला बढ़ जाता है। इसके लिए 200 मिलीलीटर मैलाथियान 50 ईसी को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें। अगर फसल को चारे के लिए उगाया गया है, तो छिड़काव के 7 दिन तक इसे पशुओं को न खिलाएं। सहायक सस्य वैज्ञानिक डॉ. सतपाल ने सलाह दी कि बरसात में खेतों में जलभराव न होने दें। खरपतवार रोकने के लिए बिजाई के एक महीने बाद एक गुड़ाई करें और जरूरत हो तो दूसरी गुड़ाई ‘व्हील हैंड हो’ से करें।
सही किस्में चुनें
ग्वार की समय पर पकने वाली किस्में जैसे एचजी 365, एचजी 563, एचजी 2-20, एचजी 870 और एचजी 884 बेहतर उत्पादन दे सकती हैं। इन किस्मों को अपनाकर और सही प्रबंधन के साथ किसान अपनी फसल को स्वस्थ रख सकते हैं और मुनाफा कमा सकते हैं।













