अगर कार दुर्घटना के बाद बीमा कंपनी ड्राइविंग लाइसेंस में कमी बताकर आपका क्लेम खारिज करती है, तो केवल इस आधार पर कंपनी की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के 8 जुलाई 2026 के फैसले में HDFC जनरल इंश्योरेंस कंपनी की ऐसी ही दलील को स्वीकार नहीं किया गया।
मामला Skoda New Laura Ambiente 1.8 TSI कार का था। कार का बीमा ₹6.95 लाख के IDV पर कराया गया था और पॉलिसी 9 मार्च 2014 से 9 मार्च 2015 तक वैध थी। इसके लिए पॉलिसीधारक ने ₹11,233 का प्रीमियम दिया था। 12 अक्टूबर 2014 को कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई और उसे Skoda सर्विस सेंटर ले जाया गया, जहां मरम्मत का खर्च करीब ₹5.28 लाख बताया गया।
इसके बाद पॉलिसीधारक ने बीमा कंपनी के सामने क्लेम पेश किया, लेकिन कंपनी ने भुगतान से इनकार कर दिया। बीमा कंपनी का कहना था कि हादसे के समय कार चला रहे व्यक्ति के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था। कंपनी ने यह भी दावा किया कि चालक के पास नागालैंड से जारी दूसरा लाइसेंस था, जिसे उसने फर्जी बताया।
क्या दो ड्राइविंग लाइसेंस होने से बीमा क्लेम खत्म हो जाता है?
उपभोक्ता आयोग ने माना कि किसी व्यक्ति के पास एक से अधिक ड्राइविंग लाइसेंस होना मोटर व्हीकल एक्ट के तहत उल्लंघन हो सकता है। ऐसे मामले में संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई भी की जा सकती है।
लेकिन आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल दो लाइसेंस होने के आधार पर बीमा कंपनी पॉलिसीधारक का क्लेम स्वतः खारिज नहीं कर सकती। आयोग के अनुसार ड्राइवर की ओर से कानून का उल्लंघन और वाहन मालिक की बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन अलग-अलग विषय हैं।
यानी अगर चालक ने नियम तोड़ा है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन इससे बीमा कंपनी की जिम्मेदारी अपने आप समाप्त नहीं होती। क्लेम खारिज करने के लिए बीमा कंपनी को पॉलिसी की शर्तों और उल्लंघन के बीच उचित आधार स्थापित करना होगा।
हरियाणा न्यूज़ पोस्ट पर ये भी पढ़ें: रास्ते में कार की बैटरी हो जाए डाउन तो क्या करें? जानिए जंप स्टार्ट का सही तरीका
आयोग ने बीमा कंपनी को कितना भुगतान करने को कहा?
पश्चिम बंगाल राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने HDFC जनरल इंश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज कर दी। आयोग ने पॉलिसीधारक को ₹3.5 लाख देने का आदेश दिया।
इस रकम पर 7 सितंबर 2016 से 6% सालाना ब्याज भी देना होगा। बीमा कंपनी ने अगर 45 दिन के भीतर भुगतान नहीं किया तो ब्याज की दर बढ़कर 9% सालाना हो जाएगी।
इसके अलावा आयोग ने मानसिक परेशानी के लिए पॉलिसीधारक को ₹1 लाख का मुआवजा देने का भी आदेश दिया। हालांकि पॉलिसीधारक ने कार की पूरी ₹6.95 लाख IDV राशि की मांग की थी, लेकिन आयोग ने पूरी IDV राशि देने का आदेश नहीं दिया।
कार मालिकों के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?
इस मामले से वाहन मालिकों के लिए एक अहम बात सामने आती है। बीमा पॉलिसी लेते समय सिर्फ प्रीमियम और IDV देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वाहन चलाने वाले व्यक्ति के वैध लाइसेंस और पॉलिसी की शर्तों को भी समझना जरूरी है।
हरियाणा न्यूज़ पोस्ट पर ये भी पढ़ें: Kia Sorento Hybrid: 4 सितंबर को आ रही 7-सीटर SUV, 238 bhp हाइब्रिड इंजन के साथ मिलेगी AWD
कार मालिक को ड्राइवर का लाइसेंस जांचना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह संबंधित वाहन चलाने के लिए सक्षम है। दुर्घटना के बाद अगर बीमा कंपनी क्लेम खारिज करती है तो पॉलिसीधारक को रिजेक्शन लेटर, सर्वेयर की रिपोर्ट और पॉलिसी की संबंधित शर्तों को ध्यान से पढ़ना चाहिए।
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि हर मामले में लाइसेंस से जुड़ी कमी के बावजूद बीमा कंपनी को भुगतान करना ही होगा। हर क्लेम में पॉलिसी की शर्तें, दुर्घटना की परिस्थितियां और कथित उल्लंघन की प्रकृति देखी जाएगी। इसलिए क्लेम खारिज होने पर दस्तावेजों के आधार को समझना पॉलिसीधारक के लिए सबसे जरूरी है। #CarInsurance #InsuranceClaim #ConsumerRights












