Chandigarh Divyang Pension 2025 High Court reprimands, daughter will get the right: चंडीगढ़ दिव्यांग पेंशन 2025 (Chandigarh Divyang Pension 2025) मामले में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई है। एक 70% दिव्यांग बेटी, पूनम, को सिर्फ शादीशुदा होने के कारण फैमिली पेंशन (family pension) से वंचित करने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। कोर्ट ने प्रशासन की याचिका खारिज कर दी और पूनम को तुरंत पेंशन, बकाया राशि पर 9% ब्याज, और 25,000 रुपये की लागत देने का आदेश दिया। यह फैसला दिव्यांगों के हक की रक्षा के लिए एक मिसाल है। आइए, इस मामले की पूरी जानकारी को सरल और स्पष्ट तरीके से समझें।
Chandigarh Divyang Pension: हाईकोर्ट का सख्त रुख
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की खंडपीठ, जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस एचएस ग्रेवाल ने चंडीगढ़ प्रशासन के रवैये को असंवेदनशील बताया। कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा होने के बावजूद एक दिव्यांग बेटी (disabled daughter) को पेंशन से वंचित करना नियमों के खिलाफ है। पूनम, जो 70% दिव्यांग है, और उसके 100% दिव्यांग पति की आय को आधार बनाकर पेंशन रोकना गलत है। कोर्ट ने इसे “यांत्रिक और सोच-विचार रहित” करार दिया। यह फैसला दिव्यांगों के अधिकारों की रक्षा को मजबूत करता है।
पेंशन के नियम और अधिकार
हाईकोर्ट ने पंजाब सिविल सर्विस नियम 6.17 का हवाला दिया। इस नियम के अनुसार, अगर कोई बेटा या बेटी शारीरिक या मानसिक रूप से इतना दिव्यांग है कि वह कमाने में असमर्थ (unable to earn) है, तो उसे 25 वर्ष से अधिक उम्र होने और शादी के बावजूद फैमिली पेंशन (family pension) का हक है। पूनम के पिता की 2014 में मृत्यु के बाद उसने पेंशन के लिए आवेदन किया, लेकिन प्रशासन ने इसे खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए पेंशन देने का आदेश दिया।
पूनम का मामला और कोर्ट का आदेश
पूनम के पिता 1999 में सेवानिवृत्त हुए और 2014 में उनका निधन हो गया। पूनम ने सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए, लेकिन अकाउंट्स ऑफिसर ने उसके पति की आय का हवाला देकर पेंशन रोक दी। हाईकोर्ट ने इसे गलत ठहराया। कोर्ट ने न केवल पेंशन शुरू करने का आदेश दिया, बल्कि बकाया राशि पर 9% ब्याज (interest on arrears) और 25,000 रुपये की लागत (cost compensation) भी देने को कहा। यह फैसला पूनम जैसे अन्य दिव्यांगों के लिए राहत भरा है।
हाईकोर्ट का यह फैसला समाज को संदेश देता है कि दिव्यांगों के अधिकारों (disabled rights) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शादी के बाद भी दिव्यांग बेटी का पेंशन का हक बना रहता है, अगर वह कमाने में असमर्थ है। यह फैसला चंडीगढ़ प्रशासन को नियमों का पालन करने और संवेदनशील रवैया अपनाने की सीख देता है। यह कदम न केवल पूनम के लिए, बल्कि सभी दिव्यांगों के लिए एक नई उम्मीद है।













