चंडीगढ़ (Haryana Transfer Policy 2025) : चंडीगढ़ में हरियाणा सरकार ने अपने हजारों कर्मचारियों के लिए लागू ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी को लेकर अहम स्थिति स्पष्ट की है। सरकार ने आगामी तबादला अभियान से ठीक पहले ‘मॉडल ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी 2025’ के तहत ‘नोशनल वैकेंसी’ (Notional Vacancy) और ‘नोशनल कैटेगरी’ के नियमों पर भ्रम दूर कर दिया है।
मुख्य सचिव कार्यालय द्वारा जारी निर्देश के अनुसार, ट्रांसफर पॉलिसी की अधिसूचना जारी होने से पहले जो पद विभागों में खाली पड़े थे, उन्हें पहले ऑनलाइन तबादला अभियान के दौरान न तो नोशनल वैकेंसी माना जाएगा और न ही उन्हें नोशनल कैटेगरी में गिना जाएगा।
अधिसूचना और पात्रता तिथि के बीच का नियम
सरकार ने स्पष्ट किया है कि ट्रांसफर पॉलिसी की अधिसूचना जारी होने की तारीख और कर्मचारियों की पात्रता (Eligibility) तय होने की तारीख के बीच जो रिक्तियां पैदा हुई हैं, उन्हें एक बार के उपाय (One-time measure) के रूप में नोशनल वैकेंसी या कैटेगरी माना जाएगा। हालांकि, एलिजिबिलिटी डेट बीत जाने के बाद अगर कोई पद खाली होता है, तो उसे वर्तमान तबादला प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाएगा। ऐसी रिक्तियों पर भविष्य में होने वाले ट्रांसफर अभियानों में नोशनल वैकेंसी या कैटेगरी के नियमों के तहत विचार किया जाएगा।
एनआईसी सॉफ्टवेयर अपडेट करने के आदेश
इन नियमों को लागू करने के लिए सरकार ने तकनीकी तैयारी भी शुरू कर दी है। सरकार ने राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC), हरियाणा इकाई को निर्देश दिए हैं कि वह मॉडल ऑनलाइन ट्रांसफर पॉलिसी के सॉफ्टवेयर में तुरंत जरूरी संशोधन करे। इन निर्देशों के बाद अब एनआईसी अपने सिस्टम और सॉफ्टवेयर को अपडेट करेगा ताकि ट्रांसफर ड्राइव के दौरान डेटा में कोई विसंगति न रहे और कर्मचारियों को परेशानी का सामना न करना पड़े।
1. इसका फायदा
भ्रम की स्थिति खत्म (Clarity): सबसे बड़ा फायदा यह है कि कर्मचारियों के बीच चल रहा कन्फ्यूजन दूर हो गया है। अब उन्हें स्पष्ट पता होगा कि कौन सी सीटें ट्रांसफर के लिए उपलब्ध हैं और कौन सी नहीं। वे ‘काल्पनिक’ या ‘अपात्र’ सीटों के लिए आवेदन करके अपना समय बर्बाद नहीं करेंगे।
सॉफ्टवेयर में त्रुटि नहीं होगी (Technical Accuracy): एनआईसी (NIC) को स्पष्ट निर्देश मिलने से सॉफ्टवेयर में अब वही सीटें दिखेंगी जो वास्तव में नीति के तहत उपलब्ध हैं। इससे ऑनलाइन प्रक्रिया के दौरान सिस्टम क्रैश होने या गलत अलॉटमेंट होने का खतरा कम हो जाएगा।
पारदर्शिता (Transparency): यह तय होने से कि ‘पात्रता तिथि’ (Eligibility Date) के बाद खाली हुए पद इस अभियान का हिस्सा नहीं होंगे, प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी। किसी को भी यह शिकायत नहीं होगी कि “फलां सीट खाली थी, मुझे क्यों नहीं मिली,” क्योंकि नियम पहले ही साफ कर दिए गए हैं।
कोर्ट केस में कमी: ट्रांसफर मामलों में अक्सर कर्मचारी कोर्ट चले जाते हैं। नियमों की स्पष्टता से भविष्य में होने वाली मुकदमेबाजी (Litigation) में कमी आएगी।
2. इसका नुकसान
विकल्पों की कमी (Reduced Options): कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ा नुकसान यह है कि ‘पात्रता तिथि’ के बाद जो पद खाली हुए हैं (जैसे किसी के रिटायरमेंट या प्रमोशन से), वे इस करंट ड्राइव में नहीं भरे जाएंगे। यानी, अगर किसी कर्मचारी के गृह जिले में आज कोई सीट खाली हुई है, लेकिन वह ‘कट-ऑफ डेट’ के बाद की है, तो वह उसे नहीं चुन पाएगा।
पसंदीदा स्टेशन छूटने का डर: जो पद अधिसूचना से पहले खाली थे, उन्हें ‘नोशनल’ नहीं माना जाएगा (यानी वे सामान्य रिक्ति हो सकती हैं या ब्लॉक हो सकती हैं, जो विभाग पर निर्भर है)। इससे कुछ कर्मचारियों को डर है कि कहीं उनकी पसंद के स्टेशन ‘नोशनल’ कैटेगरी से बाहर होने के कारण हाथ से न निकल जाएं।
अगले ड्राइव का इंतजार: जिन रिक्तियों को इस अभियान से बाहर रखा गया है, उनके लिए कर्मचारियों को अब अगले साल या अगले ट्रांसफर ड्राइव का लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
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