सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में दाखिल हो रही इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशंस की असामान्य रूप से बड़ी संख्या पर नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि इतनी अधिक अर्जियां आमतौर पर इंसानों से जुड़े मामलों में भी देखने को नहीं मिलतीं। यह टिप्पणी उस समय आई जब सुनवाई के दौरान वकीलों ने अपनी अतिरिक्त अर्जियों का उल्लेख किया।
अदालत ने क्या कहा
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि अदालत के सामने इस मामले में जरूरत से ज्यादा अर्जियां पेश की जा रही हैं।
जस्टिस मेहता के अनुसार, यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया पर अतिरिक्त दबाव डालती है और इससे मूल मुद्दे पर फैसला लेने में देरी होती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशंस का मकसद केवल जरूरी अंतरिम राहत तक सीमित होना चाहिए, न कि मुख्य सुनवाई को जटिल बनाना।
अगली सुनवाई कब
वकीलों की ओर से ट्रांसफर याचिका पर तत्काल सुनवाई की मांग की गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि मामला पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार बुधवार को सुना जाएगा।
अदालत ने भरोसा दिलाया कि सभी संबंधित अर्जियों पर उसी दिन विस्तार से सुनवाई होगी और हर पक्ष को अपनी बात रखने का मौका मिलेगा।
यह मामला जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन वी अंजारिया की तीन सदस्यीय विशेष पीठ के सामने रखा जाएगा।
कैसे शुरू हुआ यह मामला
आवारा कुत्तों से जुड़ा यह विषय 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने के बाद चर्चा में आया था।
मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया था कि
देश के कई शहरों में कुत्तों के काटने की घटनाएं बढ़ रही हैं
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बच्चों में रेबीज के मामलों में इजाफा देखा गया
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में हर साल हजारों रेबीज से संबंधित मौतें होती हैं, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की होती है। यही वजह है कि अदालत ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया।
पहले दिए गए अहम निर्देश
7 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे संवेदनशील इलाकों में कुत्तों के काटने की घटनाओं पर कड़ी टिप्पणी की थी।
अदालत के निर्देशों में शामिल था
आवारा कुत्तों का तुरंत स्टेरिलाइजेशन और वैक्सीनेशन
उन्हें निर्धारित शेल्टर होम में स्थानांतरित करना
इन कुत्तों को उसी स्थान पर वापस न छोड़ा जाए जहां से उन्हें पकड़ा गया हो
इसके अलावा, राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से सभी आवारा जानवरों को हटाने के भी आदेश दिए गए थे।
प्रशासन पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संस्थागत परिसरों में बार बार कुत्तों के काटने की घटनाएं
प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती हैं
लोगों को रोकी जा सकने वाली दुर्घटनाओं से बचाने में सिस्टम की कमजोरी दिखाती हैं
शहरी प्रशासन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्थानीय निकाय समय पर नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम लागू करें, तो इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
क्यों यह मामला अहम है
यह मुद्दा सिर्फ पशु प्रबंधन का नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां यह संकेत देती हैं कि अब इस विषय पर संतुलित और व्यावहारिक नीति की जरूरत है, जिसमें इंसानों और जानवरों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।












