Waqf Registration: सुप्रीम कोर्ट ने UMEED पोर्टल पर वक्फ संपत्तियों के अनिवार्य पंजीकरण की समयसीमा बढ़ाने से इंकार कर दिया। जानें क्यों लिया गया यह फैसला, क्या हैं इसके प्रभाव और हालिया वक्फ कानून विवादों की पूरी कहानी।
देश की वक्फ संपत्तियों को डिजिटल ढंग से दर्ज करने के लिए बनाए गए ‘उम्मीद’ (UMEED) पोर्टल पर जानकारी अपलोड करने की समयसीमा बढ़ाने से सुप्रीम कोर्ट ने साफ इंकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि समय बढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है, और जिन लोगों की आपत्तियाँ या समस्याएँ हैं, वे सीधे वक्फ न्यायाधिकरण (Tribunal) के पास जा सकते हैं।
अदालत ने क्या कहा? Waqf Registration
सोमवार को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि वक्फ अधिनियम की धारा 3B पहले से ही प्रभावित पक्षों को न्यायाधिकरण का दरवाज़ा खटखटाने का अधिकार देती है।
कोर्ट ने कहा:
“चूँकि आवेदकों के पास क़ानूनी उपाय उपलब्ध है, इसलिए हम समयसीमा बढ़ाने का आदेश नहीं दे सकते। सभी इच्छुक व्यक्ति अंतिम तिथि से पहले न्यायाधिकरण का रुख करें।”
इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने सभी लंबित याचिकाओं का निस्तारण कर दिया।
किसने समय बढ़ाने की मांग की थी?
इस मामले में AIMPLB, AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी, और कई अन्य धार्मिक–सामाजिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि:
देशभर में फैली लाखों वक्फ संपत्तियों के रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से अपडेट करना एक बड़ा काम है।
छह महीने की समयसीमा व्यवहारिक नहीं है, खासकर ग्रामीण और अव्यवस्थित रिकॉर्ड वाले क्षेत्रों में।
देरी होने पर कई सही संपत्तियाँ पंजीकरण से छूट सकती हैं।
हालांकि कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि क़ानून पहले से ही न्यायाधिकरण का विकल्प देता है।
कानून में हालिया विवाद और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व टिप्पणी
यह मामला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि 15 सितंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के कुछ विवादित प्रावधानों पर अस्थायी रोक लगा दी थी। इन प्रावधानों में शामिल था:
केवल वे लोग ही किसी संपत्ति को वक्फ घोषित कर सकते हैं, जो पिछले पाँच वर्षों से इस्लाम धर्म का पालन कर रहे हों।
“वक्फ बाय यूज़र” (Waqf by User) जैसे पुराने प्रावधान का हटाया जाना।
सरकार का तर्क था कि “वक्फ बाय यूज़र” का कई जगह दुरुपयोग हुआ है। अदालत ने इस तर्क को प्रथम दृष्टया उचित माना और कहा कि इसे हटाना मनमाना कदम नहीं लगता।
‘वक्फ बाय यूज़र’ क्या है?
बहुत सी जगह ऐसी संपत्तियों को वक्फ मान लिया जाता था जिनका लंबे समय से धार्मिक या धर्मार्थ उपयोग हो रहा था, भले ही उसके लिए कोई आधिकारिक दस्तावेज मौजूद न हो। यही व्यवस्था “वक्फ बाय यूज़र” कहलाती थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई राज्यों में इस प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए निजी ज़मीनों को भी विवादित किया गया, इसलिए सरकार ने इसे क़ानून से हटाया।
UMEED पोर्टल क्यों बनाया गया?
6 जून 2024 को केंद्र सरकार ने UMEED – Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency & Development Portal शुरू किया। इस पोर्टल का उद्देश्य है:
देशभर की सभी वक्फ संपत्तियों की जियो-टैगिंग
पूरी सूची का डिजिटल डेटाबेस
पारदर्शिता बढ़ाना और विवाद कम करना
अनधिकृत कब्ज़ों पर समय रहते कार्रवाई
कई विशेषज्ञ इसे वक्फ बोर्डों के आधुनिकीकरण की दिशा में सबसे बड़ा कदम मानते हैं।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
डिजिटल रिकॉर्ड बनने से संपत्तियों पर होने वाले झगड़े और कानूनी विवाद कम होंगे।
समयसीमा न बढ़ने से सरकार और वक्फ बोर्डों पर तेज़ी से काम पूरा करने का दबाव बढ़ेगा।
लाखों मुसलमानों से जुड़े शैक्षिक, सामाजिक और धार्मिक संस्थानों के भविष्य पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि वक्फ आय इन्हीं के लिए उपयोग होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सही ढंग से लागू हुआ, तो वक्फ बोर्डों की राजस्व क्षमता कई गुना बढ़ सकती है।












