Business ideas: ढैंचा से बनाएं हरी खाद, होगी मोटी कमाई, जानिए कैसे?

Dhaincha Farming: एक ऐसी भी खेती होती है, जिसके बहुत सारे फायदे हैं। ये खेती है ढैंचा की। अगर आप इसकी पैदावार हासिल करना चाहते हैं तो तगड़ी कमाई कर सकते हैं। वहीं इससे हरी खाद भी मिलती है।
Business ideas: कृषि क्षेत्र में भारत लगातार आगे बढ़ रहा है। अब खाद बनाने के भी नए-नए तरीके अपनाएं जा रहे हैं। दलहनी फसलों में ढैंचा की मांग खूब बढ़ी है। तमाम तरह के उर्वरक भी आ गए हैं, लेकिन आज भी एक पुराना तरीका खूब काम आता है।
ये हैं ढैंचा के जरिए हरी खाद बनाने का तरीका। दलहनी फसल लगाने से पहले खेत में ढैंचा बोने से खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। क्योंकि इसकी खेती हरी खाद और बीज के लिए होती है। तो चलिए जानते हैं कैसे करें ढैंचा की खेती और इससे आप कैसे कमा सकते हैं मुनाफा।
ढैंचा खेती क्या है?
ढैंचा चकवंड़ जैसा एक पौधा होता है, जिसका वानस्पतिक नाम सेस्बानिया बिस्पिनोसा है। इसके पेड़ की छाल से रस्सी तैयार की जाती है, तथा इसे खरी खाद की तरह भी इस्तेमाल करते हैं। राजस्थान में इसका पौधा इकड़ नाम से पुकारा जाता है। यह मध्यम कठोर भूमि और बारिश के मौसम में प्रचुरता से उगता है। इसे खरीफ की फसल में गिना जाता है।
ढैंचा की खेती में मिट्टी व जलवायु?
ढैंचा की अच्छी उपज के लिए इसके पौधों को काली चिकनी मिट्टी में उगाए। इसके अलावा हरी खाद का उत्पादन लेने के लिए किसी भी तरह की भूमि में उगाया जा सकता है। सामान्य पीएच मान और जलभराव वाली भूमि में भी इसके पौधे अच्छे से विकास कर लेते है।
ढैंचा की खेती में पौधों को किसी खास जलवायु की जरूरत नहीं होती है। किन्तु उत्तम पैदावार के लिए इसे खरीफ की फसल के साथ उगाते है। इसके पौधों पर गर्म और ठंड जलवायु का कोई विशेष असर नहीं पड़ता है,
लेकिन पौधों को सामान्य बारिश की जरूरत होती है। ढैंचा के पौधों के लिए सामान्य तापमान उपयुक्त होता है। ठंडियों में अगर अधिक समय तक तापमान 8 डिग्री से कम रहता है, तो पैदावार में फर्क पड़ सकता है।
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ढैंचा के बीजों की रोपाई का समय व तरीका?
ढैंचा के बीजों को समतल खेत में ड्रिल मशीन के माध्यम से लगाते है। ड्रिल के माध्यम से ढैंचा के बीजों को सरसों की तरह ही पंक्तियों में लगाते है। इसमें पंक्ति से पंक्ति के मध्य एक फीट की दूरी रखी जाती है, तथा बीजों को 10 सीएम की दूरी के आसपास लगाते है।
छोटी भूमि में ढैंचा के बीजो की रोपाई छिड़काव तरीके से भी कर सकते है। इसमें बीजो को समतल खेत में छिड़क दिया जाता है, और फिर कल्टीवेटर से दो हल्की जुताई की जाती है। इस तरह से बीज मिट्टी में मिल जाएगा। दोनों ही विधियों में ढैंचा के बीजो को 3 से 4 सीएम की गहराई में लगाना चाहिए।
हरी खाद की फसल लेने के लिए ढैंचा के बीजो को अप्रैल के महीने में लगाते है, और पैदावार लेने के लिए बीजो को खरीफ की फसल के समय बारिश के मौसम में लगाते है। एक एकड़ के खेत में तकरीबन 10 से 15 केजी बीज पर्याप्त होते है।
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कैसे की जाती है ढैंचा की खेती?
अगर आप ढैंचा की खेती कर रहे हैं तो आपको इसे लाइनों में बोना चाहिए। जिससे अच्छी पैदावार मिल सके। इसके लिए आप ड्रिल मशीन का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। एक एकड़ में ढैंचा की खेती में करीब 10-15 किलो बीज लगेंगे। वहीं इसकी फसल में 4-5 सिंचाई की जरूरत पड़ती है। बेहतर पैदावार के लिए निराई-गुड़ाई का भी ध्यान रखें। ताकि अच्छा उत्पादन हो। साथ ही रोगों से बचाने के लिए कीटनाशक का प्रयोग भी करें।
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ढैंचा की बची सूखी फसल का इस्तेमाल कहां किया जाता?
ढैंचा की फसल करीब 4-5 महीने में काटने के लिए तैयार हो जाती है। इसकी फलियों में बीज होते हैं, जिन्हें तोड़कर धूप में सुखाया जाता है और फिर मशीन की मदद से बीज अलग कर लिए जाते हैं। ढैंचा की बची हुई सूखी फसल का इस्तेमाल कई जगह ईंधन के रूप में होता है।
वहीं इसका इस्तेमाल टाट बांधने या सब्जियों के खेतों में पौधों को हल्की छांव देने में भी किया जाता है। एक एकड़ से करीब 25 टन तक की पैदावार मिल सकती है। ढैंचा के बीडज 40 रुपये प्रति किलो के करीब बाजार में बिकते हैं। यानी किसान इस फसल को लगभग 10 लाख रुपये में बेच सकते हैं।
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पैदावार और बीज की कीमत?
ढैंचा की फसल तकरीबन 4 से 5 माह में कटाई करने के लिए तैयार हो जाती है। जब इसके पौधों का रंग सुनहरा पीला दिखाई देने लगे तब फलियों की शाखाओं को काट ले। इसकी फलियों को धूप में सुखाकर मशीन की सहायता से बीजो को निकाल लेते है,
जिसके बाद उन्हें बाजार में बेच देते है। एक एकड़ के खेत से तकरीबन 25 टन की पैदावार मिल जाती है। ढैंचा बीज का बाजारी भाव 40 से 42 रूपए प्रति किलो होता है। इस हिसाब से किसान भाई फसल से बीजो का उत्पादन प्राप्त कर अच्छी कमाई कर सकते है।
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कैसे बनाई जाती है हरी खाद
ढैंचा से हरी खाद बनाने के लिए सबसे पहले इसे उसी खेत में उगाया जाता है, जिसमें हरी खाद की जरूरत है। जब इसके पौधे डेढ़ से दो फुट के हो जाते हैं तो खेत की मिट्टी को जुताई की मशीनों से पलटा जाता है। इससे वह पौधे मिट्टी के नीचे दब जाते हैं और हरी खाद बन जाते हैं। ढैंचा की हरी खाद से मिट्टी में नाइट्रोजन की जरूरत होती है।
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