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जनवरी में गेहूं की खेती के लिए ICAR की 5 भरोसेमंद किस्में

On: December 31, 2025 8:14 AM
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जनवरी में गेहूं की खेती के लिए ICAR की 5 भरोसेमंद किस्में
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देश के कई राज्यों में गन्ना और धान की कटाई देर से होने के कारण गेहूं की बुवाई दिसंबर के बाद जनवरी तक टल जाती है। ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है कि कम समय और बदलते मौसम में अच्छी पैदावार कैसे ली जाए। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR द्वारा विकसित कुछ विशेष गेहूं किस्में इस समस्या का व्यावहारिक समाधान देती हैं। सही किस्म चुनकर किसान जनवरी में भी संतोषजनक उत्पादन और बेहतर आमदनी हासिल कर सकते हैं।

जनवरी में गेहूं की बुवाई क्यों चुनौतीपूर्ण होती है

देर से बुवाई होने पर गेहूं को

  • कम समय में बढ़ना होता है

  • तापमान तेजी से बढ़ने लगता है

  • सिंचाई और पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अगर इस स्थिति में गलत किस्म बो दी जाए तो उपज में 20 से 30 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। इसी कारण वैज्ञानिक रूप से विकसित किस्मों का चुनाव बेहद जरूरी हो जाता है।

ICAR की भूमिका और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

ICAR हर वर्ष अलग अलग जलवायु और बुवाई समय को ध्यान में रखते हुए गेहूं की किस्में विकसित करता है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि

देर से बुवाई के लिए विकसित किस्में कम अवधि में दाना भरने की क्षमता रखती हैं और गर्मी के असर को काफी हद तक सहन कर लेती हैं

इसी शोध के आधार पर नीचे दी गई किस्में किसानों के बीच भरोसेमंद साबित हो रही हैं।

PBW 550

कम पानी में भी स्थिर पैदावार

PBW 550 को विशेष रूप से गन्ने के बाद गेहूं की बुवाई के लिए उपयुक्त माना जाता है।

  • औसत उत्पादन 22 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

    पीएम कुसुम योजना के तहत हरियाणा में 75 प्रतिशत सब्सिडी वाला सोलर पंप
    पीएम कुसुम योजना के तहत हरियाणा में 75 प्रतिशत सब्सिडी वाला सोलर पंप
  • कम सिंचाई में भी अच्छी वृद्धि

  • उत्तर भारत के कई जिलों में सफल परीक्षण

विशेषज्ञों के अनुसार यह किस्म उन किसानों के लिए फायदेमंद है जहां पानी की उपलब्धता सीमित रहती है।

DBW 234

देर से बुवाई में भरोसेमंद विकल्प

DBW 234 तेजी से लोकप्रिय हो रही किस्म है।

  • फसल अवधि लगभग 126 से 134 दिन

  • औसत उत्पादन 35 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

  • रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर

कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस किस्म से किसानों का जोखिम कम होता है और उत्पादन स्थिर बना रहता है।

HD 3086

उच्च उत्पादन और बेहतर दाने की गुणवत्ता

HD 3086 को उच्च पैदावार वाली किस्म के रूप में जाना जाता है।

  • पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में उपयुक्त

  • 140 से 145 दिनों में 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज

    हरियाणा में कपास के भाव 7710 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचे
    हरियाणा में कपास के भाव 7710 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचे
  • दाने की गुणवत्ता अच्छी होने से बाजार में मांग अधिक

कृषि मंडियों में इस किस्म का गेहूं अपेक्षाकृत बेहतर दाम पर बिकता है।

DBW 316

पूर्वी भारत के लिए पोषण और उत्पादन दोनों

धान की देर से कटाई वाले इलाकों के लिए DBW 316 खास तौर पर अनुशंसित है।

  • पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड के लिए उपयुक्त

  • औसत उत्पादन 68 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

  • प्रोटीन और जिंक की मात्रा अधिक

पोषण मूल्य अधिक होने के कारण इस किस्म से किसानों को बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना रहती है।

HI 1634

गर्मी सहन करने वाली किस्म

HI 1634 मध्य भारत के किसानों के लिए उपयोगी मानी जाती है।

  • मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान के लिए उपयुक्त

  • समय पर और थोड़ी देर से दोनों स्थितियों में बुवाई संभव

  • औसत उत्पादन लगभग 51.6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर

    भारतीय खेती में नीम पाउडर का बढ़ता उपयोग और इसके फायदे
    भारतीय खेती में नीम पाउडर का बढ़ता उपयोग और इसके फायदे

विशेषज्ञ बताते हैं कि यह किस्म बढ़ते तापमान में भी संतुलित उत्पादन देती है।

किसानों के लिए यह जानकारी क्यों जरूरी है

  • जनवरी में भी गेहूं की खेती संभव

  • सही किस्म से लागत कम और मुनाफा अधिक

  • मौसम जोखिम से बेहतर सुरक्षा

  • बाजार में गुणवत्ता के कारण अच्छी कीमत

सही निर्णय लेने से किसान अपनी आय को स्थिर रख सकते हैं, भले ही बुवाई देर से क्यों न हो।

आगे क्या करें

कृषि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसान

  • स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से बीज की पुष्टि करें

  • बुवाई से पहले मिट्टी परीक्षण कराएं

  • सिंचाई और खाद का संतुलन बनाए रखें

अमनदीप सिंह

अमनदीप सिंह एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 10 वर्षों से मौसम और कृषि से संबंधित खबरों पर गहन और जानकारीपूर्ण लेख लिख रहे हैं। उनकी स्टोरीज़ मौसम के पूर्वानुमान, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और कृषि क्षेत्र की नवीनतम तकनीकों, योजनाओं और चुनौतियों को उजागर करती हैं, जो किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। अमनदीप का लेखन सरल, विश्वसनीय और पाठक-केंद्रित है, जो कृषि समुदाय को बेहतर निर्णय लेने में मदद करता है।

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