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खपली गेहूं की बढ़ती मांग और ऊंची कीमतें, जानिए क्यों है यह अनाज खास

On: December 28, 2025 8:36 AM
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खपली गेहूं की बढ़ती मांग और ऊंची कीमतें, जानिए क्यों है यह अनाज खास
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भारत में सेहत के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच खपली गेहूं एक बार फिर चर्चा में है. ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर इसका आटा 200 से 250 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है, जबकि इसके बीजों की कीमत 8,000 से 10,000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी है. सवाल यह है कि आखिर यह पारंपरिक गेहूं इतना महंगा क्यों है और लोग इसके लिए ज्यादा पैसे चुकाने को तैयार क्यों हैं.

खपली गेहूं क्या है और कहां से आया

खपली गेहूं को प्राचीन या विरासत गेहूं भी कहा जाता है. माना जाता है कि यह हजारों साल पुरानी किस्म है, जिसे आधुनिक हाईब्रिड गेहूं की तरह ज्यादा बदला नहीं गया. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यह गेहूं प्राकृतिक रूप से विकसित हुआ है और इसमें आनुवांशिक हस्तक्षेप बहुत कम हुआ है. इसके दाने लंबे और पतले होते हैं और रंग हल्का लाल भूरा होता है, जो इसे सामान्य गेहूं से अलग पहचान देता है.

खेती सामान्य लेकिन कटाई चुनौतीपूर्ण

खपली गेहूं की खेती का तरीका सामान्य गेहूं जैसा ही है, लेकिन असली चुनौती कटाई के समय आती है.
विशेषज्ञ बताते हैं कि इसे सामान्य हार्वेस्टर या थ्रेशर से आसानी से नहीं काटा जा सकता. इसके दाने भूसे से मजबूती से जुड़े रहते हैं, जिससे अलग करने में ज्यादा मेहनत और समय लगता है. इसी कारण कटाई के दौरान वजन कम हो जाता है और किसानों को उत्पादन का नुकसान झेलना पड़ता है.

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कम उत्पादन, ज्यादा लागत

आंकड़ों के अनुसार, एक एकड़ में खपली गेहूं की पैदावार करीब 12 से 14 क्विंटल ही होती है, जबकि आधुनिक गेहूं किस्मों से 20 क्विंटल या उससे ज्यादा उत्पादन मिल जाता है.
कम उपज और ज्यादा मेहनत के कारण अधिकतर किसान इसकी खेती से दूरी बनाए रखते हैं. यही वजह है कि बाजार में इसकी उपलब्धता सीमित रहती है और कीमत ऊंची बनी रहती है.

पोषण के मामले में क्यों है आगे

पोषण विशेषज्ञ मानते हैं कि खपली गेहूं में सामान्य गेहूं की तुलना में ज्यादा फाइबर, प्रोटीन और खनिज तत्व होते हैं.
इसमें आयरन, मैग्नीशियम और जिंक अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं. इसके अलावा इसमें प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं, जो लंबे समय तक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं.

कम ग्लूटन, आसान पाचन

खपली गेहूं की सबसे बड़ी खासियत इसका कम ग्लूटन स्तर है. डॉक्टरों के अनुसार, जिन लोगों को ग्लूटन से जुड़ी परेशानी या पाचन संबंधी दिक्कत रहती है, उनके लिए यह गेहूं बेहतर विकल्प हो सकता है.
हालांकि यह पूरी तरह ग्लूटन फ्री नहीं है, लेकिन इसका असर शरीर पर अपेक्षाकृत हल्का पड़ता है.

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मधुमेह रोगियों के लिए उपयोगी

खपली गेहूं का ग्लाइसेमिक इंडेक्स सामान्य गेहहूं से कम होता है. इसका मतलब है कि इसे खाने के बाद ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ती.
डायटीशियन बताते हैं कि नियमित और संतुलित मात्रा में इसका सेवन मधुमेह रोगियों के लिए फायदेमंद हो सकता है, खासकर जब इसे रिफाइंड आटे की जगह अपनाया जाए.

स्वाद और बनावट में अलग पहचान

इस गेहूं से बने आटे का रंग हल्का लाल भूरा और बनावट थोड़ी खुरदुरी होती है. इससे बनी रोटियां या चपातियां ज्यादा देर तक नरम रहती हैं और इनमें हल्का सा नटी स्वाद महसूस होता है. कई लोग इसे पारंपरिक स्वाद से जोड़कर देखते हैं.

कीमत ज्यादा लेकिन महत्व भी उतना ही

विशेषज्ञों का मानना है कि खपली गेहूं की ऊंची कीमत केवल फैशन का नतीजा नहीं है.
कम उत्पादन, कठिन प्रोसेसिंग और बढ़ती स्वास्थ्य मांग इसकी कीमत को ऊपर ले जा रही है. आने वाले समय में यदि इसकी खेती को तकनीकी सहयोग मिले, तो कीमतों में संतुलन आ सकता है.

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अमनदीप सिंह

अमनदीप सिंह एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 10 वर्षों से मौसम और कृषि से संबंधित खबरों पर गहन और जानकारीपूर्ण लेख लिख रहे हैं। उनकी स्टोरीज़ मौसम के पूर्वानुमान, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और कृषि क्षेत्र की नवीनतम तकनीकों, योजनाओं और चुनौतियों को उजागर करती हैं, जो किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। अमनदीप का लेखन सरल, विश्वसनीय और पाठक-केंद्रित है, जो कृषि समुदाय को बेहतर निर्णय लेने में मदद करता है।

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