Agriculture Tips: No need to burn stubble: Desi Jugaad of organic fertilizer for the farmers of Haryana, know the method of Akash Chaurasia: हरियाणा में पराली जलाने की समस्या ने किसानों और प्रशासन दोनों को परेशान कर रखा है। लेकिन अब एक देसी जुगाड़ इस मुश्किल का आसान हल बनकर सामने आया है।
बुंदेलखंड के युवा किसान आकाश चौरसिया ने पराली को जैविक खाद में बदलने की अनोखी तकनीक विकसित की है, जिसे हरियाणा के किसान भी अपना सकते हैं। यह विधि न केवल पर्यावरण बचाएगी, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और फसल की पैदावार भी बढ़ाएगी। आइए, इस क्रांतिकारी फॉर्मूले को समझते हैं।
पराली जलाने का अंत, जैविक खाद की शुरुआत Agriculture Tips
हरियाणा में हर साल पराली जलाने की घटनाएं वायु प्रदूषण और प्रशासन की चिंता बढ़ाती हैं। सिरसा, फतेहाबाद, और हिसार जैसे जिलों में किसानों पर जुर्माने और केस दर्ज हो रहे हैं।
लेकिन आकाश चौरसिया का देसी वेस्ट डीकंपोजर इस समस्या का टिकाऊ समाधान है। यह तकनीक पराली, फसल के अवशेष, और खेत के कचरे को कार्बनिक खाद में बदल देती है। हिसार के किसान रमेश शर्मा ने कहा, “पराली जलाने से धुआं और जुर्माना, दोनों झेलने पड़ते हैं। यह जुगाड़ हमारी लागत कम करेगा और फसल को फायदा पहुंचाएगा।” यह विधि हरियाणा के किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है।
आकाश चौरसिया: जैविक खेती का चैंपियन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सम्मानित आकाश चौरसिया पिछले 14 साल से जैविक खेती और मल्टी-लेयर फार्मिंग पर काम कर रहे हैं। उन्होंने गोबर, गोमूत्र, गुड़, उड़द का आटा, और गोंद जैसे स्थानीय संसाधनों से वेस्ट डीकंपोजर तैयार किया है। आकाश बताते हैं, “यह डीकंपोजर पराली और खेत के कचरे को खाद में बदल देता है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।
उनकी इस तकनीक को हरियाणा के किसान आसानी से अपना सकते हैं, क्योंकि इसमें महंगे रसायनों की जरूरत नहीं पड़ती। सिरसा की एक किसान मंजू देवी ने कहा, “आकाश जी की विधि सस्ती और आसान है। हम इसे जरूर आजमाएंगे।”
वेस्ट डीकंपोजर बनाने की सरल विधि
आकाश चौरसिया की विधि बेहद आसान और किफायती है। इसके लिए 20 किलो गोबर, 20 किलो गोमूत्र, 2 किलो उड़द का आटा, 2 किलो गुड़, और 500 ग्राम गोंद को मिलाकर एक मिश्रण तैयार करें। इस मिश्रण को डिब्बे में डालकर 24 घंटे के लिए रख दें। इसके बाद यह वेस्ट डीकंपोजर बनकर तैयार हो जाता है।
इसे पानी में मिलाकर खेत में छिड़काव करें या पराली और कचरे पर डाल दें। अगर पूरे खेत में इस्तेमाल करना हो, तो छिड़काव के बाद जुताई करें और खेत को 10-15 दिन के लिए छोड़ दें। यह प्रक्रिया पराली को कार्बनिक खाद में बदल देगी। कुरुक्षेत्र के एक कृषि विशेषज्ञ डॉ. सुरेंद्र यादव ने कहा, “यह विधि वैज्ञानिक और पर्यावरण के लिए लाभकारी है।”
फायदे: कम लागत, ज्यादा पैदावार
यह देसी जुगाड़ न केवल पराली जलाने की समस्या को खत्म करता है, बल्कि किसानों की लागत भी कम करता है। कार्बनिक खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है, जिससे गेहूं, धान, और सब्जियों की पैदावार में इजाफा होता है। यह तकनीक गोबर और बायो-कम्पोस्ट जैसे अन्य अपशिष्टों को भी खाद में बदल सकती है।
फतेहाबाद के किसान बलविंदर सिंह ने कहा, “हम रासायनिक खाद पर हजारों रुपये खर्च करते हैं। यह जुगाड़ हमारा पैसा बचाएगा और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।” यह विधि हरियाणा के छोटे और बड़े किसानों के लिए एक किफायती समाधान है।
पर्यावरण और हरियाणा का भविष्य
पराली जलाने से होने वाला वायु प्रदूषण हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के लिए गंभीर समस्या है। आकाश चौरसिया की यह तकनीक न केवल प्रदूषण कम करेगी, बल्कि जैविक खेती को बढ़ावा देगी। हरियाणा सरकार भी पराली प्रबंधन और जैविक खेती पर जोर दे रही है।
इस विधि को अपनाकर किसान न केवल जुर्माने से बच सकते हैं, बल्कि अपनी आय भी बढ़ा सकते हैं। सोनीपत की एक पर्यावरण कार्यकर्ता प्रिया ने कहा, “यह तकनीक हमारे खेतों और हवा को बचाएगी। हर किसान को इसे अपनाना चाहिए।”
हरियाणा के किसानों के लिए सलाह
अगर आप हरियाणा में खेती करते हैं और पराली जलाने की समस्या से जूझ रहे हैं, तो आकाश चौरसिया की इस विधि को जरूर आजमाएं।
स्थानीय कृषि केंद्रों या जैविक खेती विशेषज्ञों से संपर्क करें और इस देसी जुगाड़ को अपने खेतों में लागू करें। यह न केवल आपके खेतों को उपजाऊ बनाएगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी आपका योगदान होगा। आइए, हरियाणा को हरा-भरा और प्रदूषण-मुक्त बनाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाएं।












