रबी के मौसम में प्याज किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण कमाई का स्रोत बन सकती है. पूसा दिल्ली के कृषि विशेषज्ञों ने हाल ही में किसानों को उपयोगी सुझाव दिए हैं, जिसमें रोपाई का सही समय, देखभाल की विधियां और रोगों से बचाव शामिल है. अगर किसान इन तरीकों को अपनाएं, तो फसल की पैदावार बढ़ सकती है और बाजार में बेहतर दाम मिल सकते हैं.
प्याज की खेती का महत्व और पृष्ठभूमि
भारत में प्याज एक प्रमुख सब्जी है, जो सालाना करीब 25 मिलियन टन उत्पादित होती है. रबी सीजन, जो सर्दियों में आता है, इस फसल के लिए आदर्श होता है क्योंकि ठंडा मौसम बल्बों के विकास में मदद करता है. कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर के सिंह (काल्पनिक विशेषज्ञ) कहते हैं, “प्याज की अच्छी फसल न केवल किसानों की आय बढ़ाती है, बल्कि बाजार में कीमतों को स्थिर रखने में भी योगदान देती है.” पिछले सालों में देर से रोपाई के कारण कई क्षेत्रों में पैदावार 20 प्रतिशत तक घटी थी, इसलिए समय पर कार्रवाई जरूरी है.
रोपाई का सही समय और तकनीक
किसानों को सलाह है कि दिसंबर के आखिर से लेकर 15 जनवरी तक प्याज की रोपाई पूरी कर लें. इससे फसल को बढ़ने के लिए पर्याप्त ठंडा मौसम मिलता है. रबी के लिए पूसा व्हाइट राउंड, पूसा माधवी और पूसा रेड जैसी किस्में चुनें, जो अच्छी पैदावार देती हैं. पहाड़ी इलाकों में ब्राउन स्पैनिश बेहतर काम करती है. रोपाई के लिए 7 से 8 सप्ताह पुरानी मजबूत पौधों का इस्तेमाल करें, और पंक्तियों के बीच 15 सेमी तथा पौधों के बीच 10 सेमी की दूरी रखें. इससे बल्ब एक समान आकार के बनते हैं.
खरपतवार और शुरुआती देखभाल कैसे करें
फसल की शुरुआत में खरपतवार प्याज को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं. रोपाई के 2 से 3 दिन बाद पेंडीमेथालिन की 3.5 लीटर मात्रा को 800 से 1000 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़कें. यह छिड़काव सिंचाई से पहले करें, ताकि दवा का असर लंबे समय तक रहे. इससे खरपतवार की वृद्धि रुक जाती है और फसल स्वस्थ रहती है.
कीट और रोगों से बचाव के उपाय
रबी में थ्रिप्स कीट प्याज पर तेजी से हमला कर सकता है. नियमित जांच करें और शुरुआत में ही नियंत्रण करें. परपल ब्लॉच रोग के लिए डाइथेन एम-45 को 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें, साथ में 1 ग्राम टीपोल जैसा चिपकने वाला पदार्थ जोड़ें. कृषि विशेषज्ञ डॉ. मीना शर्मा (काल्पनिक) बताती हैं, “समय पर रोग नियंत्रण से पत्तियां हरी रहती हैं और बल्ब का विकास बेहतर होता है.” इससे पैदावार में 15 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है.
अन्य रबी फसलों के लिए उपयोगी सलाह
सरसों की देर से बोई फसल में पौधों को विरल करें और खरपतवार हटाएं. सफेद रतुआ रोग और चेपा कीट पर नजर रखें. चने में फली छेदक कीट के लिए प्रति एकड़ 3 से 4 फेरोमोन ट्रैप लगाएं और टी-आकार के पक्षी स्टैंड बनाएं. गोभी, फूलगोभी और गांठगोभी की रोपाई मेड़ों पर करें. पालक, धनिया और मेथी की बुवाई के लिए यह समय अच्छा है, और पत्तों की बढ़त के लिए 20 किग्रा यूरिया प्रति एकड़ छिड़कें.
आलू और टमाटर में झुलसा रोग की जांच जारी रखें. लक्षण दिखने पर कार्बेंडाजिम 1 ग्राम या डाइथेन एम-45 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर इस्तेमाल करें. मटर पर 2 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव फलियों की संख्या बढ़ाता है. कद्दू जैसी सब्जियों की शुरुआती फसल के लिए बीजों को छोटी पॉलीथिन बैग में पॉलीहाउस में रखें.
इसका महत्व और प्रभाव
ये सुझाव अपनाने से किसानों की आय में सुधार होता है और खाद्य सुरक्षा मजबूत बनती है. पिछले दशक में ऐसी तकनीकों से प्याज उत्पादन में 10 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है. अगर किसान इन तरीकों को अपनाएं, तो बाजार में कमी नहीं आएगी और उपभोक्ताओं को सस्ती सब्जियां मिलेंगी. आगे मौसम के बदलाव को देखते हुए, कृषि विभाग से और अपडेट लें.













