Electric car insurance cost in India : सस्ती रनिंग कॉस्ट और शून्य प्रदूषण के चलते देश भर में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी लोग तेजी से ईवी अपना रहे हैं। लेकिन कार खरीदने से पहले सिर्फ चार्जिंग और शुरुआती कीमत का आकलन करना काफी नहीं है। इलेक्ट्रिक कार का इंश्योरेंस प्रीमियम इसकी कुल ओनरशिप लागत का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है।
कानूनन जरूरी थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस के प्रीमियम में पेट्रोल और इलेक्ट्रिक कारों (EV insurance vs petrol car insurance) के बीच ज्यादा फर्क नहीं होता। असली अंतर ओन डैमेज कवर में आता है, जहां ईवी का प्रीमियम सामान्य कारों से काफी ऊपर निकल जाता है।
कितना अधिक है ईवी का प्रीमियम?
बीमा कंपनियों और ऑनलाइन पोर्टल्स के आंकड़ों के मुताबिक, पेट्रोल-डीजल कारों की तुलना में ईवी का प्रीमियम 15 से 25 फीसदी और कुछ मामलों में 25 से 60 फीसदी तक ज्यादा बैठता है। उदाहरण के लिए, कारवाले के आंकड़ों के अनुसार टाटा नेक्सन पेट्रोल का बीमा करीब 40 हजार रुपये में होता है, जबकि टाटा नेक्सन ईवी (Tata Nexon EV insurance cost) के लिए यह रकम लगभग 50 हजार रुपये तक पहुंच जाती है।
ऊंची कीमत और आईडीवी का सीधा गणित
इलेक्ट्रिक कारें अपने पेट्रोल-डीजल वेरिएंट से लगभग 12 से 30 फीसदी तक महंगी बिकती हैं। कार की एक्स-शोरूम कीमत अधिक होने से उसकी आईडीवी यानी इंश्योर्ड डिक्लेयर्ड वैल्यू बढ़ जाती है। बीमा कंपनियां इसी आईडीवी के आधार पर ओन डैमेज प्रीमियम तय करती हैं, जिससे ईवी का बीमा अपने आप महंगा हो जाता है।
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बैटरी बदलने का 7 लाख रुपये तक खर्च
ईवी का सबसे संवेदनशील और कीमती हिस्सा उसकी बैटरी पैक (electric vehicle battery replacement cost) है। डिजिट जनरल इंश्योरेंस की रिपोर्ट बताती है कि कई प्रमुख मॉडलों में बैटरी की कीमत पूरी कार की लागत का 50 से 70 फीसदी तक होती है। बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस के अनुसार, बड़े बैटरी पैक को बदलने का खर्च 7 लाख रुपये तक जा सकता है। बैटरी डैमेज के इस भारी वित्तीय जोखिम को कवर करने के लिए बीमा कंपनियां प्रीमियम की दरें ऊंची रखती हैं।
महंगे पार्ट्स और सीमित सर्विस नेटवर्क
इलेक्ट्रिक मोटर और हाई-वोल्टेज सिस्टम की मरम्मत (own damage cover for EV) पेट्रोल इंजन की तुलना में अधिक जटिल होती है। वाहन निर्माता कंपनियां अक्सर छोटे चाइल्ड पार्ट्स अलग से उपलब्ध नहीं कराती हैं, जिसके कारण खराबी आने पर पूरा मॉड्यूल ही बदलना पड़ता है। इसके अलावा, छोटे शहरों और कस्बों में ईवी के आधुनिक डायग्नोस्टिक उपकरण और प्रशिक्षित तकनीशियन सीमित हैं। तकनीशियनों की इस कमी और लंबे रिपेयर समय के चलते सर्विस सेंटरों पर लेबर कॉस्ट काफी बढ़ जाती है। #ElectricVehicles #CarInsurance #AutoNews #EVIndia












