Black hole signals interference: क्या आपने कभी सोचा है कि वैज्ञानिक यह कैसे तय करते हैं कि पृथ्वी अंतरिक्ष में कहां है? इसका जवाब है ब्लैक होल्स से आने वाले बेहद हल्के रेडियो सिग्नल्स।
ये सिग्नल्स लाखों सालों का सफर तय करके हमारी धरती तक पहुंचते हैं और वैज्ञानिक इनका इस्तेमाल कर पृथ्वी की पोजिशन और उसकी मूवमेंट को मापते हैं।
लेकिन अब वैज्ञानिकों को चिंता है कि हमारी WiFi और मोबाइल की तेज़ रेडियो तरंगें इन नाज़ुक सिग्नलों को दबा रही हैं। अगर यही सिलसिला चलता रहा तो हमारी पृथ्वी की कॉस्मिक लोकेशन की सटीक जानकारी खो सकती है!
Black hole signals: कैसे काम करता है ये कॉस्मिक मैपिंग सिस्टम?
वैज्ञानिक रेडियो टेलीस्कोप के ज़रिए इन ब्लैक होल्स के रेडियो सिग्नल्स को कैप्चर करते हैं। फिर “जियोडेसी” नाम की तकनीक से दुनियाभर के ऑब्जर्वेशन स्टेशन इन सिग्नलों को सिंक्रोनाइज़ करते हैं। इससे पृथ्वी के घूमने की गति, उसकी दिशा और उसकी स्थिति का बिल्कुल सटीक डेटा मिलता है।
ये डेटा न सिर्फ वैज्ञानिक रिसर्च के लिए जरूरी है, बल्कि GPS, इंटरनेट टाइमिंग, ग्लोबल कम्युनिकेशन और एविएशन जैसी कई टेक्नोलॉजीज भी इसी पर निर्भर करती हैं।
स्पेक्ट्रम हो गया है भीड़भाड़ वाला
पहले रेडियो स्पेक्ट्रम का बड़ा हिस्सा सिर्फ एस्ट्रोनॉमी के लिए रिज़र्व था। लेकिन अब 1G से लेकर 6G तक हर मोबाइल नेटवर्क इसका हिस्सा हथिया रहा है। WiFi, स्मार्ट डिवाइसेज़ और रोज़मर्रा की टेक्नोलॉजी रेडियो सिग्नल्स को इतना ज्यादा उत्पन्न कर रही हैं कि अब वैज्ञानिकों को ब्लैक होल्स के सिग्नल्स तक पहुंचना मुश्किल हो गया है।
इन गैलेक्सी से आने वाले सिग्नल्स बेहद हल्के होते हैं, जबकि हमारे फोन और राउटर्स से निकलने वाले सिग्नल लाखों गुना ज्यादा ताकतवर होते हैं। इससे वैज्ञानिकों का रिसर्च प्रभावित हो रहा है।
क्यों जरूरी हैं साफ-सुथरे कॉस्मिक सिग्नल्स?
जियोडेसी कोई सिर्फ वैज्ञानिक शौक नहीं है। इससे जुड़ी तकनीकें हमारी अंतरराष्ट्रीय मनी ट्रांसफर, जहाज़ों की नेविगेशन, प्लेन्स की रूटिंग और सप्लाई चेन जैसी कई जरूरी सेवाओं का हिस्सा हैं। अगर सटीक लोकेशन डेटा नहीं मिला तो इन सेवाओं में रुकावट आ सकती है।
क्या है समाधान?
वैज्ञानिक चाहते हैं कि दुनियाभर में “रेडियो क्वायट ज़ोन” बनाए जाएं जहां मोबाइल और वाईफाई जैसे डिवाइसेज़ की रेडियो तरंगें प्रतिबंधित हों। साथ ही, वे चाहते हैं कि कुछ खास फ्रिक्वेंसीज़ सिर्फ एस्ट्रोनॉमी के लिए रिज़र्व रहें।
लेकिन दिक्कत ये है कि रेडियो स्पेक्ट्रम हर देश अलग तरीके से मैनेज करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाना काफी मुश्किल है। लेकिन अगर वक्त रहते कदम नहीं उठाए गए, तो ब्लैक होल्स की वो झलक जो हमें ब्रह्मांड में हमारी जगह बताती है, वो शोर में खो सकती है।
लोग नहीं जानते कि उनका WiFi भी बना है दुश्मन!
ज़्यादातर लोग इस बात से अनजान हैं कि उनके मोबाइल फोन और WiFi राउटर अंतरिक्ष विज्ञान को नुकसान पहुंचा सकते हैं। जैसे-जैसे वायरलेस टेक्नोलॉजी का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे जागरूकता और प्लानिंग की जरूरत और भी बढ़ती जा रही है।












