डिजिटल डेस्क, चंडीगढ़ : चंडीगढ़ मेयर चुनाव में भाजपा के सौरभ जोशी ने जीत दर्ज की। कांग्रेस ने क्रॉस वोटिंग और विनोद तावड़े की रणनीति के डर से आप से गठबंधन नहीं किया, जिससे भाजपा को फायदा मिला।
चंडीगढ़ मेयर चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राजनीति आंकड़ों से ज्यादा रणनीति का खेल है। भारतीय जनता पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत का जादुई आंकड़ा नहीं था, फिर भी मेयर की कुर्सी पर कमल खिल गया। भाजपा उम्मीदवार सौरभ जोशी ने आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को मात देते हुए जीत हासिल की। इस जीत के पीछे की असली वजह अब सामने आ रही है, जो सीधे तौर पर भाजपा के रणनीतिकार विनोद तावड़े और कांग्रेस के अंदरूनी डर से जुड़ी है।
19 का आंकड़ा चाहिए था, 18 पर मिली जीत
चंडीगढ़ नगर निगम के सदन में मेयर बनने के लिए 19 वोटों की दरकार थी। भाजपा के पास अपने पार्षदों और सांसद का वोट मिलाकर कुल संख्या 18 ही थी। गणित के हिसाब से विपक्ष मजबूत था, लेकिन नतीजों में भाजपा बाजी मार ले गई।
भाजपा के सौरभ जोशी को 18 वोट मिले। आम आदमी पार्टी के योगेश ढींगरा को 11 वोट मिले। कांग्रेस के गुरप्रीत गोबी को महज 7 वोट हासिल हुए।
अगर कांग्रेस और आप मिलकर चुनाव लड़ते तो यह आंकड़ा 18 के पार जा सकता था, लेकिन दोनों अलग अलग लड़े और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर जीत गई।
विनोद तावड़े की एंट्री से बिगड़ा कांग्रेस का खेल
इस पूरे सियासी उलटफेर के केंद्र में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का नाम सामने आ रहा है। तावड़े को चुनावी प्रबंधन का मास्टर माना जाता है। जैसे ही भाजपा ने उन्हें चंडीगढ़ चुनाव का प्रभारी नियुक्त किया, विपक्षी खेमे में खलबली मच गई।
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि विनोद तावड़े की मौजूदगी ने कांग्रेस हाईकमान को रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया। तावड़े के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए कांग्रेस को डर था कि उनके पार्षदों में सेंधमारी हो सकती है।
गठबंधन क्यों टूटा? इनसाइड स्टोरी
सूत्रों के मुताबिक, चुनाव से पहले कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठबंधन लगभग तय माना जा रहा था। अगर यह गठबंधन होता तो भाजपा के लिए जीतना मुश्किल हो जाता। लेकिन कांग्रेस के भीतर एक गुप्त बैठक हुई जिसमें एक बड़ा डर सामने रखा गया।
कांग्रेसी नेताओं को आशंका थी कि अगर उन्होंने AAP के साथ गठबंधन किया और वोटिंग के दौरान कांग्रेस के पार्षदों ने ‘क्रॉस वोटिंग’ कर दी, तो पार्टी की भारी फजीहत होगी। विनोद तावड़े की रणनीति के आगे कांग्रेस अपने पार्षदों की वफादारी को लेकर आश्वस्त नहीं थी।
भाजपा की लगातार पांचवीं जीत
विनोद तावड़े की रणनीति और विपक्ष के बिखराव ने भाजपा को लगातार पांचवीं बार मेयर पद पर काबिज कर दिया है। इसे भाजपा के लिए एक बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब विपक्ष एकजुट नहीं होता, तो उसका सीधा लाभ सत्ताधारी दल को मिलता है और चंडीगढ़ में ठीक यही हुआ।
बीजेपी की बी टीम बनने का डर
कांग्रेस को सता रहा था कि अगर गठबंधन के बावजूद उनके पार्षदों ने भाजपा को वोट दे दिया, तो आम आदमी पार्टी को हमला करने का मौका मिल जाएगा। केजरीवाल की पार्टी कांग्रेस पर ‘भाजपा की बी टीम’ होने का आरोप लगा सकती थी। इस बदनामी और राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए कांग्रेस ने हार स्वीकार करना बेहतर समझा। उन्होंने गठबंधन से पैर पीछे खींच लिए और अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। इसी बिखराव का सीधा फायदा भाजपा को मिला।












