Supreme Court Live-In Maintenance: Big question on live-in relationship in Supreme Court! Will alimony be given? Know the whole matter!: नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में गुजारा भत्ते (मेंटेनेंस) से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा कदम उठाया है। बीते शुक्रवार को कोर्ट ने एक पुरुष की याचिका पर नोटिस जारी किया,
जिसमें उसने अपनी लिव-इन पार्टनर की ओर से फैमिली कोर्ट में दायर गुजारा भत्ते की मांग को चुनौती दी थी। यह मामला केरल हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें पुरुष की याचिका खारिज कर दी गई थी। निचली अदालत ने महिला पार्टनर के पक्ष में फैसला सुनाया था। आइए, इस सनसनीखेज मामले की पूरी जानकारी लेते हैं!
केरल हाईकोर्ट का फैसला Supreme Court Live-In Maintenance
केरल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा था कि अगर कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं, तो CrPC की धारा 125 के तहत वैवाहिक प्रमाण की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि अगर यह साबित हो जाए कि दोनों पार्टनर लंबे समय तक दांपत्य जीवन की तरह रहे हैं, तो महिला गुजारा भत्ते की मांग कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ? Supreme Court Live-In Maintenance
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच के सामने पुरुष पार्टनर ने दलील दी कि लिव-इन रिलेशनशिप में गुजारा भत्ता मांगना पूरी तरह गलत और भ्रामक है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर महिला पार्टनर को नोटिस जारी कर छह हफ्तों में जवाब देने को कहा है। यह मामला अब देशभर में चर्चा का विषय बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट का अब तक का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी लिव-इन रिलेशनशिप पर कई अहम फैसले दिए हैं। 2005 में ‘ललिता टोप्पो बनाम स्टेट ऑफ झारखंड’ मामले में सवाल उठा था कि क्या लंबे समय तक साथ रहने से लिव-इन को वैवाहिक दर्जा मिलेगा और क्या महिला को गुजारा भत्ता मिल सकता है?
2018 में तत्कालीन CJI रंजन गोगोई की बेंच ने कहा था कि लिव-इन पार्टनर को घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत ज्यादा कानूनी राहत मिल सकती है। इसके अलावा, ‘कमला बनाम एम.आर. मोहन कुमार’ मामले में कोर्ट ने साफ किया था कि CrPC धारा 125 के तहत गुजारा भत्ते के लिए वैवाहिक प्रमाण जरूरी नहीं है।
गुजारा भत्ता कानून क्या कहता है?
CrPC की धारा 125 एक सामाजिक न्याय का कानून है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई पत्नी, बच्चा या बुजुर्ग माता-पिता बेसहारा न रहे। इसका मकसद उन लोगों को वित्तीय मदद देना है जो अपनी आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर हैं। इस कानून के तहत, अगर पति, बच्चे या माता-पिता के पास पर्याप्त साधन हैं और वे अपने आश्रितों की देखभाल से इनकार करते हैं, तो अदालत हस्तक्षेप करती है।












