चंडीगढ़ में आयोजित एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री नायब सैनी ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कड़े तेवर दिखाए हैं। मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा और प्रधान सचिव अरुण गुप्ता के साथ प्रदेश के नागरिक अस्पतालों की स्थिति का जायजा लिया। सरकार ने अब यह अनिवार्य कर दिया है कि राज्य के किसी भी सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीज को बाहर के मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि दवाओं की उपलब्धता को एक सेंट्रलाइज्ड पोर्टल के जरिए ट्रैक किया जाए, जिससे मुख्यालय को हर जिले के स्टॉक की सटीक जानकारी रहे।
डॉक्टरों की बढ़ेगी जवाबदेही, सीएमओ होंगे जिम्मेदार
नई व्यवस्था के तहत यदि कोई डॉक्टर किसी मरीज को बाहर की दवा लिखता है, तो उसे ओपीडी स्लिप पर स्पष्ट रूप से अंकित करना होगा कि वह दवा अस्पताल के स्टोर में क्यों उपलब्ध नहीं है। बिना किसी ठोस कारण के निजी मेडिकल स्टोर की दवा लिखने वाले डॉक्टरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री ने इस पूरी व्यवस्था के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (CMO) की सीधे तौर पर जवाबदेही तय कर दी है। अस्पतालों में दवाओं की कमी न हो, इसके लिए खरीद प्रक्रिया को सरल बनाते हुए एक साल का पैनल तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। सीएमओ को अब दवा खत्म होने से कम से कम चार दिन पहले ही पैनल में शामिल एजेंसियों को सूचित करना होगा।
उन्नत मशीनें और स्टाफ की कमी होगी दूर
सिर्फ दवाइयां ही नहीं, बल्कि जांच सुविधाओं को लेकर भी मुख्यमंत्री ने सख्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश के प्रमुख नागरिक अस्पतालों में सीटी स्कैन (CT Scan) और एमआरआई (MRI) जैसी उन्नत मशीनें चालू हालत में होनी चाहिए। बैठक में अस्पतालों में नर्सिंग स्टाफ और डॉक्टरों की पर्याप्त तैनाती सुनिश्चित करने पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही अस्पतालों के वार्डों और परिसर में साफ-सफाई की सतत निगरानी के लिए भी विशेष दिशा-निर्देश दिए गए हैं ताकि संक्रमण का खतरा कम हो सके और मरीजों को बेहतर वातावरण मिल सके।
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