Haemophilia Injection Shortage Panipat News (पानीपत) : स्वास्थ्य विभाग के पास पिछले दो माह से हीमोफिलिया के फैक्टर-8 व फैक्टर-9 इंजेक्शन नहीं हैं। दो माह पहले वेयरहाउस से 30 इंजेक्शन आए थे। वह दो दिन में ही खत्म हो गए थे। इंजेक्शन की इस कमी ने पानीपत के 33 हीमोफिलिया के मरीजों की जान को खतरे में डाल दिया है। यह रोगी इंजेक्शन के लिए रोहतक पीजीआइ व दिल्ली के अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं।
मरीज को 20-30 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं। हीमोफिलिया के मरीज को एक माह में आमतौर पर तीन इंजेक्शन की जरूरत होती है। मरीजों को कर्ज लेकर जिंदगी के लिए इंजेक्शन खरीदने पड़ रहे हैं। माडल टाउन, जाटल रोड, मतलौडा, थिराना व संजय चौक निवासी हीमोफिलिया के मरीजों ने बताया कि उनको माह में आमतौर पर तीन बार फैक्टर-8 व फैक्टर-9 इंजेक्शन की जरूरत होती है। पहले उन्हें जिला नागरिक अस्पताल में इंजेक्शन मिल जाते थे।
अब पिछले तीन माह से वह इंजेक्शन के लिए भटक रहे हैं। उन्हें जिला नागरिक अस्पताल में इंजेक्शन इमरजेंसी स्थिति के लिए बचाकर रखे इंजेक्शन एक डाक्टर ने बताया कि अस्पताल में इंजेक्शन तो हैं लेकिन डाक्टर मरीज की हालत के अनुसार उनका इस्तेमाल करते है।
इमरजेंसी स्थिति के लिए इंजेक्शन को अपने पास बचाकर रखते हैं। कई बार ऐसा हीमोफिलिया का मरीज आ सकता है जिसको चोट लगी हो, उसका रक्त न रुक रहा हो। उसकी जान बचाने के लिए यह इंजेक्शन बचाकर रखा जाता है।
मरीज दिल्ली व रोहतक पीजीआइ में धक्के खाने पड़ रहे हैं। अब रोहतक पीजीआइ के डाक्टरों ने भी इंजेक्शन देने से इन्कार कर दिया है। उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह अपने पैसे से इंजेक्शन खरीद सकें। एक इंजेक्शन की कीमत 20-30 हजार रुपये के बीच होती है।
पानीपत के सिविल सर्जन डा. विजय मलिक ने बताया कि सरकार ने स्वास्थ्य विभाग को इंजेक्शन की लोकल पहले इंजेक्शन की सप्लाई में कुछ कमी आ गई। इसके बाद फैक्टर-8 के इंजेक्शन आ गए थे। अब फैक्टर-9 के इंजेक्शन भी मंगवाए हैं। इसकी मांग भेजी गई है।
मरीजों को इंजेक्शन में किसी प्रकार की दिक्कत न हो इसके लिए स्वास्थ्य विभाग गंभीर है। परचेज की अनुमति दी है लेकिन अधिकारी इसमें अनदेखी कर रहे हैं। उनकी जान से खिलवाड़ किया जा रहा है। वह आए दिन अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं।
क्या है हीमोफिलिया
हीमोफिलिया को डाक्टर एक बीमारी की तरह देखते हैं जिसका एक बार में इलाज पूरी तरह से संभव नहीं है। यह एक जेनेटिक डिसआर्डर है, क्योंकि यह माता-पिता से आगे बच्चे में होता है। खून में जब थाम्बोप्लास्टिन प्रोटीन की कमी हो जाती है तो शरीर में क्लोटिंग फैक्टर न होने के चलते चोट लगने के बाद शरीर से खून नहीं रुकता, जिसके चलते फैक्टर-8 या 9 का इंजेक्शन लगता है। हीमोफिलिया दो तरह का होता है।
हीमोफिलिया ए में फैक्टर-8 की कमी होती है और हीमोफिलिया-बी में घटक 9 की कमी होती है। दोनों ही खून में थक्का बनाने के लिए जरूरी हैं। ये एक दुर्लभ बीमारी है। अगर हीमोफिलिया बीमारी की गंभीरता कम है तो दवाइयों से भी इलाज हो सकता है। अगर समय पर फैक्टर-8 व फैक्टर-9 के इंजेक्शन न मिले तो शरीर के अंदर भी ब्लीडिंग हो सकती है। यह काफी जानलेवा साबित हो सकता है।












