Guru Tegh Bahadur martyrdom: 17वीं सदी का भारत… जब मुगल बादशाह औरंगजेब का कठोर शासन पूरे हिंदुस्तान पर छाया हुआ था। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदुओं पर जबरन धर्मांतरण का खतरा मंडरा रहा था। कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार चरम पर था। मंदिर तोड़े जा रहे थे, जनेऊ कटवाए जा रहे थे, माथे पर तिलक लगाने पर मौत की सजा दी जा रही थी।
इसी अंधकार के दौर में एक आवाज गूंजी— Guru Tegh Bahadur martyrdom
“सिर दीजै पर धर्म न दीजै।”
यह आवाज थी सिखों के नवम गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी की।
सिखों के नवम गुरु: जन्म, बाल्यकाल और गुरुगद्दी
गुरु तेग बहादुर का जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था। उनका बचपन का नाम त्यागमल था। वे गुरु हरगोबिंद जी के सबसे छोटे पुत्र थे। बचपन से ही उनमें असाधारण साहस और आत्मविश्वास दिखाई देता था। इतिहास में मिलता है कि सिर्फ 13 साल की उम्र में उन्होंने मुगल सेना से युद्ध लड़ा, जिसमें उनके अद्भुत पराक्रम की झलक मिली।
मार्च 1665 में गुरु हरकृष्ण जी के देहांत के बाद उन्हें सिखों का नौवां गुरु बनाया गया। गुरु बनने के बाद उन्होंने अध्यात्म, सेवा और मानवता की राह पर अनगिनत कार्य किए।
कश्मीरी पंडितों की पुकार और गुरु का निर्णय
साल 1675 की गर्मियों में कश्मीर के पंडितों का एक समूह गुरु तेग बहादुर से मिलने आनंदपुर साहिब पहुंचा। उनके मुखिया पंडित किरपा राम ने रोते हुए औरंगजेब के अत्याचार बताए—
“महाराज, या इस्लाम कबूल करो या मर जाओ… यही फरमान मिला है।”
उसी समय उनके 9 साल के पुत्र गोबिंद राय (भविष्य के गुरु गोबिंद सिंह) ने पूछा—
“पिता जी, इस संकट को कौन टाल सकता है?”
गुरु जी बोले— “कोई ऐसा महान पुरुष जो अपना सिर दे सके।”
गोबिंद राय ने कहा— “आपसे महान कौन?”
यहीं से इतिहास की दिशा बदल गई।
गुरु ने कश्मीरी पंडितों से कहा—
“औरंगजेब से जाकर कहो कि अगर गुरु तेग बहादुर इस्लाम कबूल कर लें, तो सभी कर लेंगे।”
औरंगजेब की नफरत और गुरु की गिरफ्तारी
गुरु का संदेश सुनकर औरंगजेब उबल पड़ा। उसे पहले ही इस बात से आपत्ति थी कि सिख लोग अपने गुरु को “सच्चा बादशाह” कहते थे।
इतिहासकार बताते हैं कि औरंगजेब को “तेग बहादुर” नाम भी अखरता था, क्योंकि “बहादुर” मुगल दरबार में ऊंचा खिताब था।
गुरु तेग बहादुर अपने साथियों—भाई मति दास, भाई सती दास, भाई दयाला, भाई जैता और भाई उदय के साथ दिल्ली रवाना हुए, पर रास्ते में ही सभी गिरफ्तार कर लिए गए।
चार महीने तक अमानवीय यातनाएं दी गईं।
11 नवंबर 1675—जब धर्म के लिए सिर तो दिया, पर झुके नहीं
औरंगजेब के सामने पेश किए जाने पर उसने पूछा—
“जनेऊ और तिलक वालों के लिए अपनी जान क्यों दे रहे हो?”
गुरु का उत्तर इतिहास बन गया—
“हिंदुओं ने शरण ली है। अगर मुसलमान भी शरण लें, तो उनके लिए भी प्राण दे दूंगा।”
औरंगजेब ने तीन विकल्प दिए—इस्लाम कबूल करो, चमत्कार दिखाओ या मर जाओ।
गुरु का शांत जवाब था—
“हम धर्म नहीं छोड़ेंगे। चमत्कार नहीं दिखाएंगे। जो करना है करो।”
इसके बाद उनके साथियों पर भयानक अत्याचार हुए:
भाई दयाला को खौलते पानी में उबाल दिया गया
भाई मति दास को आरी से बीच से चीर दिया गया
भाई सती दास को रूई में लपेटकर जिंदा जला दिया गया
गुरु जी सब देखते रहे, पर अडिग रहे—“वाहे गुरु… वाहे गुरु…”
सीसगंज और रकाबगंज गुरुद्वारे की स्थापना
फिर वार हुआ…
जल्लाद जलालुद्दीन ने एक ही वार में गुरु का सिर धड़ से अलग कर दिया।
भीड़ थम गई, पर गुरु के चेहरे पर मुस्कान थी।
उनके शिष्य भाई जैता दास ने गुरु का पवित्र शीश उठाया और आनंदपुर ले जाकर 9 वर्षीय गोविंद राय को सौंप दिया।
दिल्ली में जिस जगह शहादत हुई, वहाँ सीसगंज गुरुद्वारा है।
गुरु का धड़ लखी शाह ने ले जाकर अग्नि-संस्कार किया।
उस स्थान पर आज रकाबगंज गुरुद्वारा स्थित है।
गुरु तेग बहादुर—मानवता के रक्षक
गुरु तेग बहादुर का बलिदान सिर्फ हिंदू या सिख धर्म के लिए नहीं था।
यह मानवता, स्वतंत्रता और धर्म की रक्षा के लिए था।
उन्होंने सिखा दिया—
जहाँ-जहाँ अत्याचार होगा, वहाँ कोई-न-कोई तेग बहादुर खड़ा होगा।
“वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह।”












