Krishna Chaturthi Vrat Katha: कृच्छ्र चतुर्थी, जिसे कई लोग संकट चौथ भी कहते हैं, माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी पर मनाई जाती है। इस व्रत से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा माता पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी से संबंधित है।
गणेश जी का सिर क्यों काट दिया शिव जी ने? Krichra Chaturthi Vrat Katha
एक बार माता पार्वती स्नान के लिए गईं और उन्होंने गणेश जी को द्वार पर पहरा देने को कहा। आदेश था—
“मेरी अनुमति के बिना किसी को अंदर न आने देना।”
कुछ देर बाद भगवान शिव पहुंच गए और भीतर जाने लगे। गणेश जी ने माता की आज्ञा के चलते उन्हें रोक दिया। इससे शिव जी क्रोधित हो गए और उन्होंने गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया।
पार्वती का क्रोध और शिव का पश्चाताप
जब माता पार्वती को इस घटना का पता चला, वे अत्यंत दुखी हुईं और उन्होंने क्रोध में प्रलय लाने की चेतावनी दी। देवताओं ने उन्हें शांत करने की कोशिश की। तब शिव जी ने एक हाथी का सिर लाकर गणेश जी के शरीर से जोड़ दिया और उन्हें पुनर्जीवन दिया—
साथ ही वरदान दिया कि त्रिलोक में सबसे पहले उनकी पूजा होगी।
माता पार्वती ने भी आशीर्वाद देते हुए कहा कि–
“जो भी व्यक्ति माघ कृष्ण चतुर्थी को गणेश जी की पूजा करेगा, उसके जीवन के सभी संकट (कृच्छ्र) दूर होंगे और उसे संतान, धन व मोक्ष की प्राप्ति होगी।”
तभी से यह तिथि कृच्छ्र चतुर्थी / संकट चौथ के रूप में प्रसिद्ध हो गई।
राजा हरिश्चंद्र और रानी तारामती की कथा
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र और उनकी पत्नी तारामती बेहद कठिन जीवन-परिस्थितियों से गुजर रहे थे।
अपने दुखों को दूर करने के लिए रानी तारामती ने गणेश जी का यह व्रत रखा।
व्रत के प्रभाव से—
उनके सभी कष्ट दूर हुए
राज्य वापस मिला
पुत्र की प्राप्ति हुई
तभी से यह माना जाता है कि कृच्छ्र चतुर्थी का व्रत जीवन के हर संकट को दूर करता है।












