प्रयागराज, Shoe shape pillar bridge Prayagraj : उत्तर प्रदेश के संगम शहर प्रयागराज में जमुना नदी पर बना पुराना यमुना पुल सिर्फ एक रेलवे और रोड पुल नहीं है, बल्कि यह वास्तुकला का एक अद्भुत चमत्कार है। लगभग 160 साल पुराने इस लोहे के पुल से रोजाना हजारों यात्री और ट्रेनें गुजरती हैं, लेकिन बहुत कम लोग इसके पिलर नंबर 13 के पीछे छिपे रहस्य को जानते हैं। नदी के ठीक बीचों-बीच स्थित इस पिलर को अगर आप ध्यान से देखेंगे तो यह आम खंभों की तरह गोल या चौकोर नहीं, बल्कि इंसानी जूते या हाई-हील सैंडल के आकार का दिखाई देता है। इस अजीबोगरीब डिजाइन के पीछे ब्रिटिश काल के इंजीनियरों की कड़ी मेहनत और एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है।
यमुना नदी में पिलर नंबर 13 बनाने की आफत
जब ब्रिटिश शासनकाल में इस पुल का निर्माण कार्य चल रहा था, तब इंजीनियरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पिलर नंबर 13 को खड़ा करने की थी। यह पिलर यमुना नदी के सबसे गहरे हिस्से में बनना था, जहां पानी की गहराई के साथ-साथ नदी का बहाव भी बेहद खतरनाक और तेज था। निर्माण दल जब भी खंभे की नींव डालने के लिए ढलाई का भारी-भरकम प्लेटफॉर्म तैयार करता, अगली सुबह यमुना नदी की तेज लहरें उसे ताश के पत्तों की तरह बहा ले जाती थीं। कोई भी इंजीनियर इस पिलर की नींव को नदी के तल पर टिका नहीं पा रहा था और मजदूरों की दिन-रात की मेहनत पर पानी फिर रहा था।
सैंडल के आइडिया ने बदल दी पुल की तकदीर
लगातार दो साल तक नाकाम रहने के बाद इस प्रोजेक्ट के मुख्य ब्रिटिश इंजीनियर मिस्टर सिवले बेहद परेशान हो चुके थे। इसी कशमकश के बीच एक रात मिस्टर सिवले ने एक अजीब सपना देखा, जिसने इस पुल की तकदीर बदल दी। उन्होंने सपने में देखा कि उनकी पत्नी उसी गहरी नदी के तेज बहाव के बीच खड़ी हैं और उन्होंने पैर में ऊंचे हील (हाई-हील) की सैंडल पहनी हुई है। नदी का तेज पानी उनकी सैंडल के नुकीले हिस्से से टकराकर दो हिस्सों में कटकर अगल-बगल से निकल रहा था और सैंडल अपनी जगह पर पूरी तरह टस से मस नहीं हो रही थी।
ऐसे बना रहस्यमयी पाया
सुबह उठते ही इंजीनियर मिस्टर सिवले ने सपने में देखे गए सैंडल के उसी डिजाइन को कागज पर उतारा और पिलर नंबर 13 का नया नक्शा तैयार किया। उन्होंने पिलर के सामने वाले हिस्से को जूते की नोक की तरह नुकीला और ढलानदार बनाया ताकि वह पानी के सीधे और भीषण दबाव को झेलने के बजाय उसकी धार को बीच से फाड़ सके। यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा और दो साल से अटका यह रहस्यमयी पाया बनकर तैयार हो गया। यही कारण है कि आज डेढ़ सदी बीत जाने के बाद भी प्रयागराज का यह पुराना पुल हर बाढ़ और तेज बहाव को झेलते हुए सीना ताने खड़ा है।
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