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गेहूं के किसानों के लिए अलर्ट! फसल को बर्बाद कर रहे ये खरपतवार, ऐसे करें बचाव

On: फ़रवरी 24, 2026 7:58 पूर्वाह्न
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गेहूं के किसानों के लिए अलर्ट! फसल को बर्बाद कर रहे ये खरपतवार, ऐसे करें बचाव
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Wheat Crop Disease Control: गेहूं की खेती करने वाले किसानों के लिए फसल की अच्छी पैदावार हासिल करना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। बुवाई के बाद गेहूं की मुख्य फसल के साथ कई तरह के खरपतवार उग आते हैं जो उत्पादन में भारी गिरावट का कारण बनते हैं।

इन अवांछित पौधों में गोयला, चील, प्याजी, मोरवा, गुल्ली डंडा, बथुआ, अकरी, वनबट्टी, कृष्णनील और जंगली जई मुख्य रूप से शामिल हैं। ये खरपतवार मुख्य फसल के साथ पोषक तत्वों, मिट्टी की नमी और जगह के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा करते हैं।

इस आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण गेहूं के पौधों का सही से विकास नहीं हो पाता और पैदावार काफी कम हो जाती है। इसलिए किसानों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे समय रहते उचित खरपतवार नियंत्रण के उपाय अपनाएं।

रसायनों से खरपतवार का प्रभावी नियंत्रण

खेतों से इन जिद्दी खरपतवारों को पूरी तरह खत्म करने के लिए कृषि विशेषज्ञों द्वारा कई रसायनों की सिफारिश की जाती है। किसान अपनी फसल पर पेंडीमिथेलीन, सल्फोसल्फूरान, मेट्रीब्यूजिन, 2,4 डी या आइसोप्रोफ्यूरान जैसे खरपतवारनाशकों का तय मात्रा में छिड़काव कर सकते हैं। इसके अलावा क्लोडीनोफॉप, मेटासल्फूरान, मिसोसल्फूरान और आइडोसल्फूरान का उपयोग भी खरपतवारों के प्रभावी नियंत्रण में काफी मददगार साबित होता है।

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करनाल बंट यानी गेहूं का विनाशकारी कैंसर

खरपतवारों के साथ-साथ कई गंभीर बीमारियां भी गेहूं की तैयार फसल को पूरी तरह से चौपट कर सकती हैं। इनमें सबसे खतरनाक रोग करनाल बंट है जिसे आम बोलचाल में गेहूं का कैंसर भी कहा जाता है। यह एक ऐसा विनाशकारी रोग है जो बीज, मिट्टी और हवा के माध्यम से तेजी से फैलता है और इसके खतरे को देखते हुए इसे क्वारंटाइन के लिए प्रतिबंधित श्रेणी में रखा गया है।

करनाल बंट के स्पष्ट लक्षण और रोकथाम

इस गंभीर बीमारी के लक्षण मुख्य रूप से पौधों में फूल आने की अवस्था के दौरान ही स्पष्ट दिखाई देते हैं। संक्रमित पौधों के दानों के चारों ओर एक काला पाउडर जमा हो जाता है और ट्राइमिथाइलेमाइन रसायन के कारण दानों से एक अजीब सी बदबू आने लगती है।

इस रोग से बचाव के लिए किसानों को करनाल बंट प्रतिरोधी किस्मों की ही बुवाई करनी चाहिए और फूल आने के समय खेत में किसी भी हाल में सिंचाई नहीं करनी चाहिए। रासायनिक नियंत्रण के तहत बाविस्टिन 1000 ग्राम प्रति हेक्टेयर और प्रोकोनोजोल 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करना चाहिए, साथ ही बुवाई से पहले एग्रोसान-जी.एन. (पी.एम.ए.) 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बीजोपचार करना अनिवार्य है।

लूज स्मट रोग का फसल पर प्रभाव और उपाय

अनावृत कंडवा या लूज स्मट रोग लगने पर गेहूं के खेतों में जल्दी निकलने वाली बालियों के दानों पर काला पाउडर बन जाता है जिसे स्पुर कहते हैं। इसके लक्षण पौधों के तने या पत्तियों पर नजर नहीं आते बल्कि सीधे अंडाशयों को प्रभावित करते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोग ग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर जमीन में गाड़ देना चाहिए और सोलर उपचार विधि से बीजों को संक्रमण रहित बनाना चाहिए।

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इसके अलावा गर्म जल उपचार के तहत 540 डिग्री पर बीजों को 30 मिनट तक रखना चाहिए और फफूंदनाशक दवा वीटा वेक्स 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम से बीजोपचार करना चाहिए।

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अमनदीप सिंह

अमनदीप सिंह एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 10 वर्षों से मौसम और कृषि से संबंधित खबरों पर गहन और जानकारीपूर्ण लेख लिख रहे हैं। उनकी स्टोरीज़ मौसम के पूर्वानुमान, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और कृषि क्षेत्र की नवीनतम तकनीकों, योजनाओं और चुनौतियों को उजागर करती हैं, जो किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। अमनदीप का लेखन सरल, विश्वसनीय और पाठक-केंद्रित है, जो कृषि समुदाय को बेहतर निर्णय लेने में मदद करता है।

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