रोहतक, 23 मई (हरियाणा न्यूज पोस्ट)। Honey bee migration: आम बोलचाल में जिसे हम मधुमक्खियों का देशाटन कहते हैं, वह असल में शहद उद्योग की लाइफलाइन है। मधुमक्खियों की पूरी जिंदगी फूलों के रस और पराग के इर्द-गिर्द घूमती है। किसी भी इलाके में साल के बारहीन महीने फूल नहीं रह सकते। जैसे ही किसी क्षेत्र में बहार का मौसम खत्म होता है, वैसे ही इन नन्हे जीवों के सामने पेट भरने का संकट खड़ा हो जाता है। इसी अकाल से निपटने के लिए पेशेवर मधुमक्खी पालक (बी-कीपर्स) अपने लकड़ी के बक्सों को गाड़ियों में लादकर उन राज्यों का रुख करते हैं जहां फसलें और बागान फूलों से लद चुके होते हैं।
क्या होता है मधुमक्खियों का माइग्रेशन?
अक्टूबर-नवंबर के महीने में जब उत्तर भारत में गुलाबी ठंड दस्तक देती है, तो मधुमक्खी पालकों के ट्रक उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा के मैदानी इलाकों की तरफ दौड़ने लगते हैं। इस दौरान इन राज्यों में लाखों हेक्टेयर भूमि पर सरसों, तोरिया और चने की बुवाई होती है। जब खेतों में सरसों की पीली चादर बिछती है, तो मधुमक्खियों के लिए भोजन का भंडार खुल जाता है। इस सीजन में बनने वाला सफेद सरसों का शहद देश-विदेश के बाजारों में सबसे महंगी कीमत पर बिकता है। हरियाणा और पंजाब के किसान भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि ये मक्खियां उनकी फसल के लिए कितनी जरूरी हैं। Honey Bee Migration
पहाड़ों की ठंडी वादियों में गर्मियों का ठिकाना
मार्च का महीना खत्म होते ही मैदानी इलाकों में सूरज की तपिश बढ़ने लगती है और गर्म हवाएं (लू) चलने लगती हैं। यह मौसम मधुमक्खियों के अनुकूल नहीं होता। ऐसे में बिना वक्त गंवाए इन छत्तों को हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में पहुंचा दिया जाता है। पहाड़ों में गर्मियों के शुरुआती महीनों में सेब के बागानों और बुरांश के लाल फूलों की बहार होती है। ठंडी आबोहवा और जंगली जड़ी-बूटियों का रस चूसकर मक्खियां न सिर्फ भीषण गर्मी से बच जाती हैं, बल्कि बेहद शुद्ध और औषधीय गुणों से भरपूर ऑर्गेनिक शहद भी तैयार करती हैं।
मानसून का संकट और दक्षिण के विशाल बागानों की शरण
देश में जब जून-जुलाई के दौरान मानसून सक्रिय होता है, तो उत्तर और पहाड़ी दोनों ही क्षेत्रों में खुले फूलों की भारी कमी हो जाती है। लगातार बारिश के कारण मक्खियों का बाहर निकलना भी दूभर हो जाता है। इस सुस्त सीजन को मात देने के लिए केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के रबर, नारियल और कॉफी के बागान सबसे मुफीद जगह बनते हैं। दक्षिण भारत के इन घने बागानों में भारी बारिश और नमी के बीच भी पेड़ों पर फूल आते रहते हैं, जिससे मधुमक्खियों की कॉलोनी बची रहती है और उनका भरण-पोषण होता रहता है। Honey Bee Migration
कैसे होता है लाखों मधुमक्खियों का ट्रांसफर
एक राज्य से दूसरे राज्य तक सैकड़ों किलोमीटर का यह सफर तय करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। मधुमक्खी पालक इस काम को बेहद सलीके से अंजाम देते हैं। बक्सों को गाड़ियों में लादने और उतारने का पूरा ऑपरेशन हमेशा सूरज ढलने के बाद या तड़के अंधेरे में किया जाता है। इसकी वजह यह है कि रात के वक्त सभी मधुमक्खियां अपने छत्ते के भीतर लौट आती हैं। रात के ठंडे तापमान में सफर करने से बक्सों के अंदर गर्मी नहीं बनती और दम घुटने से मक्खियों के मरने का खतरा लगभग शून्य हो जाता है।
किसानों को बिना लागत मिलता है बंपर मुनाफा
इस पूरे चक्र का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि इससे सिर्फ शहद बेचने वालों की जेब नहीं भरती, बल्कि देश की कृषि को भी नया जीवन मिलता है। जब ये मधुमक्खियां रस तलाशने के लिए एक फूल से दूसरे फूल पर बैठती हैं, तो प्राकृतिक रूप से क्रॉस-पॉलिनेशन (परागण) होता है। कृषि वैज्ञानिकों के आंकड़े गवाही देते हैं कि जिन खेतों के आसपास मधुमक्खियों के बॉक्स रखे जाते हैं, वहां फसलों की क्वालिटी बेहतर होती है और पैदावार में 20 से 30 फीसदी की सीधी बढ़ोतरी दर्ज की जाती है। यही वजह है कि आज का जागरूक किसान अपने खेतों में इन्हें रखने की जगह खुद देता है। Honey Bee Migration
बीमारियों और बदलते मौसम का जोखिम भी है बड़ा रोड़ा
ऐसा नहीं है कि यह कारोबार पूरी तरह से जोखिम मुक्त है। देशाटन के रास्ते में चुनौतियां भी कदम-कदम पर मिलती हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण अचानक बदलने वाला मौसम, बेमौसम की ओलावृष्टि और अत्यधिक पाला कई बार पूरी की पूरी कॉलोनी को साफ कर देता है। इसके अलावा, सफर के दौरान बक्सों में लगने वाले परजीवी (माइट्स) और संक्रामक बीमारियां भी भारी नुकसान पहुंचाती हैं। इन सब दिक्कतों के बावजूद, भारतीय मधुमक्खी पालक अपने पुराने तजुर्बे, आधुनिक तकनीकों और सरकारी मदद के भरोसे इस मुनाफे के चक्र को बखूबी चला रहे हैं। Honey Bee Migration
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