हरियाणा के फतेहाबाद में दस बेटियों के बाद एक परिवार में बेटे का जन्म हुआ है। ग्यारहवें बच्चे की यह डिलीवरी काफी जोखिम भरी थी लेकिन अस्पताल में मां और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।
हरियाणा के जींद और फतेहाबाद जिले की सीमा पर बसे एक गांव में इस हफ्ते एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक 37 वर्षीय महिला ने अपने 11वें बच्चे के रूप में एक बेटे को जन्म दिया है। इससे पहले इस दंपत्ति की 10 बेटियां हैं। हालांकि यह खबर खुशी लेकर आई है लेकिन इसने महिलाओं के स्वास्थ्य और समाज में बेटे की चाहत जैसे गंभीर विषयों पर एक बार फिर नई बहस छेड़ दी है।
हाई रिस्क डिलीवरी और डॉक्टरों की चुनौती
जींद के उचाना कस्बे में स्थित एक निजी अस्पताल में यह डिलीवरी संपन्न हुई। अस्पताल के संचालक और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ नरवीर श्योराण ने बताया कि यह मामला चिकित्सकीय दृष्टि से काफी चुनौतीपूर्ण था। महिला के शरीर में खून की भारी कमी थी और बार-बार गर्भधारण करने की वजह से शरीर काफी कमजोर हो चुका था।

डॉक्टरों के अनुसार सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करने के लिए महिला को तीन यूनिट खून चढ़ाना पड़ा। गनीमत यह रही कि नॉर्मल डिलीवरी के जरिए बच्चा पैदा हुआ और फिलहाल जच्चा और बच्चा दोनों की हालत स्थिर बताई जा रही है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी अधिक बार गर्भधारण करना महिला के जीवन के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
क्या कहते हैं बच्चे के पिता
बच्चे के पिता संजय कुमार पेशे से मजदूर हैं और उनकी शादी साल 2007 में हुई थी। संजय ने बताया कि उनके परिवार और कुछ बड़ी बेटियों की इच्छा थी कि घर में एक भाई का आगमन हो। उनका कहना है कि वे अपनी सभी 10 बेटियों को अच्छी शिक्षा देने का प्रयास कर रहे हैं और सबसे बड़ी बेटी अभी 12वीं कक्षा में पढ़ रही है।
सोशल मीडिया पर उठ रहे सवालों के जवाब में संजय ने कहा कि वे बेटियों को कमतर नहीं समझते हैं। उनके अनुसार आजकल लड़कियां हर क्षेत्र में नाम रोशन कर रही हैं लेकिन एक बेटे की चाहत परिवार में लंबे समय से बनी हुई थी। हालांकि एक वायरल वीडियो में जब उनसे उनकी सभी बेटियों के नाम पूछे गए तो वे कुछ नामों पर अटकते हुए भी नजर आए।
बार बार गर्भधारण के स्वास्थ्य पर प्रभाव
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार मां बनने से महिला के शरीर पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इससे हड्डियों की कमजोरी, एनीमिया और गर्भाशय से जुड़ी जटिलताएं बढ़ जाती हैं। एक सामान्य मजदूर परिवार के लिए इतने बड़े कुनबे का पालन-पोषण करना और मां की सेहत का ध्यान रखना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो 11 बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च एक मजदूर के लिए काफी कठिन होता है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि ग्रामीण इलाकों में अभी भी बेटे को बुढ़ापे का सहारा मानने वाली पुरानी सोच हावी है जिसके कारण लोग बड़े परिवारों का जोखिम उठाते हैं।
हरियाणा में लिंगानुपात के बदलते आंकड़े
अगर हम आंकड़ों की बात करें तो हरियाणा में लिंगानुपात की स्थिति में पिछले कुछ वर्षों में सुधार देखने को मिला है। साल 2025 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार राज्य का लिंगानुपात बढ़कर 923 हो गया है जो साल 2024 के मुकाबले 13 अंक अधिक है।
हालांकि यह आंकड़ा अभी भी 1020 के राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है। सरकार के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों ने लोगों की मानसिकता बदलने में मदद तो की है लेकिन इस तरह के मामले बताते हैं कि जमीनी स्तर पर अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है।
सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता
इस तरह की घटनाएं समाज को आईना दिखाती हैं। बेटे की चाहत में मां की जान जोखिम में डालना और आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज करना भविष्य के लिए संकट पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि छोटे परिवार के फायदों और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में ग्रामीण क्षेत्रों में और अधिक काउंसलिंग की जरूरत है ताकि ऐसी परिस्थितियों को रोका जा सके।












