अंबाला में अग्रवाल सभा अंबाला छावनी के चुनाव को लेकर बड़ा प्रशासनिक फैसला सबके सामने या चुका है। वहीं राकेश कंसल गुट और सुभाष गोयल गुट एक दूसरे पर आरोप लगते हुए इसे राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। चाहे कुछ भी हो इसमें सभा का मजाक भी बना और नुकसान अलग से हुआ। चुनाव प्रक्रिया में करीब 2 से 3 लाख तक के नुकसान का अनुमान है।
अग्रवाल सभा के चुनाव में बवाल
सभा के पूर्व प्रधान राकेश कंसल का कहना है कि ये उनके और उनके साथियों की जीत है। कल कंसल गुट की माला वाली फोटो भी खूब वायरल हुई थी। कुछ लोगों ने कहा कि ये कंसल गुट की हार की जीत है। वहीं कुछ ने कहा कि चुनाव को ऐसा रंग नहीं देना चाहिए। इससे सभा की ही बदनामी हुई है। देखा जाए तो कंसल गुट के चाणक्य ‘कुज्जा’ इस पटकथा के रचयिता रहे।
इस बारे में पूर्व प्रधान राकेश कंसल ने कहा कि चुनाव में गड़बड़ी हो रही थी। इसको रोक जाना जरूरी था। ये सभा की नैतिक जीत है। वे कहते हैं कि चुनाव नियम कायदे से होने चाहिए। अगर सुभाष गोयल गुट को सभा की इतनी ही चिंता थी तो 2021 के बाद चुनाव क्यों नहीं करवाए गए?
दूसरी तरफ अगर सुभाष गोयल गुट की बात की जाए उनका कहना है कि राकेश कंसल गुट सभा के चुनाव नहीं होना देना चाहते। अगर उनकी चलती तो सभा सरकार के पास चली जाती। लेकिन उनके और साथियों के प्रयास से वे सरकार से लड़े और चुनाव की बात चली।
अब बात ये है की सभा के नुकसान का क्या होगा? इसकी भरपाई कौन करेगा? इया पर भी कंसल और सुभाष गुट के तर्क अलग हैं। राकेश कंसल का कहना है की इसकी सारी जिम्मेदारी सुभाष गोयल गुट की है। उन्होंने आनन फानन में गलत फैसले लिए। तो इसकी रिकवरी सुभाष गोयल गुट करे।
वहीं सुभाष गोयल का कहना है कि राकेश कंसल गुट के कारण सभा को नुकसान हुआ है। इसकी भरपाई की जिम्मेदारी उनको करनी चाहिए। अब दोनों गुट आमने सामने हैं।
ऐसे में पूर्व प्रधान अशोक गोयल का कहना है की पूरे मामले में सभा का नाम खराब हुआ है। जब से सभा बनी है, कभी ऐसी नोबत नहीं आई। पूरे प्रकरण के कारण सभा की छवि को नुकसान पहुंचा है।
बता दें कि उद्योग एवं वाणिज्य महानिदेशक और सोसायटियों के रजिस्ट्रार जनरल डॉ. यश गर्ग ने मतदाता सूची से जुड़े गंभीर विवादों के चलते पूरे चुनाव को निरस्त कर दिया है। अब चुनाव की पूरी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू होगी और अगले छह महीनों में इसे पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं।
क्या हुआ और क्यों हुआ
डॉ. यश गर्ग ने 14 अक्तूबर 2025 को स्टेट रजिस्ट्रार द्वारा जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत विवादित मतदाता सूची को स्वीकृति दी गई थी। जांच में सामने आया कि सूची में कई गंभीर खामियां थीं, जिनसे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती थी।
इस फैसले के साथ ही 4 जनवरी को प्रस्तावित मतदान पर रोक लगा दी गई है। नई मतदाता सूची को मंजूरी मिलने के बाद ही आगे की चुनावी तारीखें घोषित होंगी।
अब आगे क्या होगा
प्रशासन ने सभा में प्रशासक की नियुक्ति का आदेश दिया है। प्रशासक को कानून के प्रावधानों के तहत पूरी जांच के बाद नई मतदाता सूची तैयार करनी होगी।
नई प्रक्रिया के प्रमुख बिंदु
• जिला रजिस्ट्रार स्वयं हर सदस्य के नाम का सत्यापन करेंगे
• मृतक या संदिग्ध नामों को सूची से हटाया जाएगा
• प्रक्रिया पूरी होने की समय सीमा अधिकतम छह महीने
• अंतिम स्वीकृति से पहले सार्वजनिक सूचना देना अनिवार्य
मतदाता सूची में क्या गड़बड़ियां मिलीं
अपीलकर्ता उमेश गुप्ता की ओर से अधिवक्ता रोहित जैन ने विभाग के सामने गंभीर आरोप रखे थे। उनका कहना था कि सूची में बड़ी संख्या में ऐसे नाम शामिल थे जो वास्तविक मतदाता नहीं थे।
जांच में सामने आए तथ्य
• 42 ऐसे नाम जिनकी मृत्यु हो चुकी थी
• एक ही पते पर कई मतदाताओं की प्रविष्टि
• फर्जी और अपूर्ण जानकारियों वाले रिकॉर्ड
इन खामियों के कारण चुनाव की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक था।
अधिकारियों की भूमिका पर सख्त टिप्पणी
रजिस्ट्रार जनरल ने अपने आदेश में जिला और स्टेट रजिस्ट्रार की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि बिना गहन जांच के सूची को मंजूरी देना प्रशासनिक लापरवाही है।
आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि 1,460 सदस्यों वाली सभा की सूची को केवल 5 सदस्यों की समिति ने पास किया, वह भी बिना कोरम पूरा किए और बिना सार्वजनिक सूचना के। यह प्रक्रिया नियमों के विरुद्ध मानी गई।
आगे की तस्वीर
अब सभी की नजरें नई मतदाता सूची और आगामी चुनावी कार्यक्रम पर टिकी हैं। यदि प्रक्रिया नियमों के अनुसार पूरी की जाती है, तो यह मामला साफ और भरोसेमंद चुनाव व्यवस्था की मिसाल बन सकता है।












