डिजिटल डेस्क, यमुनानगर : आपने अब तक केवल कहानियों में ही सुना होगा कि नदियों में सोना बहता है। लेकिन हरियाणा के यमुनानगर जिले में यह हकीकत है। यहां बहने वाली बोली नदी केवल पानी और रेत नहीं बल्कि अपने साथ कुदरती खजाना लेकर आती है।
हरियाणा के यमुनानगर जिले में बोली नदी बहती है, जो सोम नदी की सहायक है। यहां के स्थानीय लोग पीढ़ियों से नदी की रेत से सोने के कण छानकर अपनी आजीविका चलाते आ रहे हैं। हिमालय से आने वाली बारिश की बूंदें पहाड़ों की मिट्टी को काटकर सोने के महीन टुकड़ों को साथ लाती हैं।
इस अनोखे काम में करीब 250 लोग लगे हैं, जो रोजाना 1500 से 2000 रुपये कमाते हैं। लेकिन यह जोखिम भरा है, क्योंकि अचानक पानी बढ़ने से खतरा रहता है। आइए इसकी कहानी जानते हैं।
शिवालिक की पहाड़ियों से आता है खजाना
भूवैज्ञानिकों के अनुसार हिमाचल प्रदेश की शिवालिक पहाड़ियों में कई तरह के खनिज तत्व मौजूद हैं। जब बारिश होती है तो पानी का तेज बहाव पहाड़ों की मिट्टी और चट्टानों को काटता हुआ नीचे आता है।
इसी प्रक्रिया में सोने के बारीक कण भी पानी के साथ बहकर यमुनानगर की बोली नदी में आ जाते हैं। जैसे ही पानी का वेग कम होता है ये भारी कण रेत के साथ किनारे पर जम जाते हैं। स्थानीय भाषा में इसे ‘प्लेसर गोल्ड’ कहा जाता है।
चार पीढ़ियों से चल रहा है यह काम
यमुनानगर के मानकपुर और आसपास के गांवों में यह काम नया नहीं है। यहां के निवासी बताते हैं कि उनके बाप दादा भी यही काम करते थे। आज उनकी चौथी और पांचवी पीढ़ी इस विरासत को संभाल रही है।
बचपन से ही बच्चे अपने माता पिता के साथ नदी किनारे जाने लगते हैं और धीरे धीरे रेत से सोना निकालने की कला में माहिर हो जाते हैं। जब बोली नदी में पानी कम होता है तो ये कारीगर गंगा और सतलुज जैसी बड़ी नदियों का रुख भी करते हैं।
कैसे निकाला जाता है रेत से सोना
यह प्रक्रिया जितनी सुनने में रोमांचक लगती है असल में उतनी ही कठिन है। कारीगरों के पास विशेष प्रकार के लकड़ी के औजार होते हैं। वे नदी के किनारे से रेत और बजरी इकट्ठा करते हैं। इसके बाद उसे पानी की मदद से बार बार धोया और छाना जाता है।
हल्की रेत पानी के साथ बह जाती है जबकि सोने के कण भारी होने के कारण लकड़ी के पात्र में नीचे रह जाते हैं। कई घंटों की मेहनत के बाद कभी कभी एक से दो ग्राम सोना हाथ लगता है।
सरकार भी जारी करती है टेंडर
यह काम चोरी छिपे नहीं बल्कि प्रशासन की निगरानी में होता है। बारिश का सीजन शुरू होते ही जिला प्रशासन और खनन विभाग इसके लिए बाकायदा टेंडर जारी करता है। ठेकेदार लाखों रुपए देकर यह टेंडर लेते हैं और फिर दिहाड़ी पर मजदूरों को काम पर रखते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक पिछले सीजन में एक कश्ती यानी नाव के लिए लगभग 20 हजार रुपए की फीस तय की गई थी। एक कश्ती पर आमतौर पर तीन से चार लोग काम करते हैं। एक मजदूर को दिन भर की मेहनत के बाद औसतन दो हजार रुपए तक की कमाई हो जाती है।
जान जोखिम में डालकर होती है कमाई
सोना निकालना आसान काम नहीं है। मजदूरों को घंटों पानी के बीच खड़ा रहना पड़ता है जिससे त्वचा संबंधी बीमारियों का खतरा रहता है। सबसे बड़ा जोखिम अचानक आने वाली बाढ़ है।
पहाड़ियों में बारिश होने पर नदी का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है। कई बार काम में मग्न कारीगर तेज बहाव की चपेट में आ जाते हैं। फिर भी पेट की भूख और सोने की चमक इन्हें हर रोज इस नदी किनारे खींच लाती है।
सोना निकालने की विधि
कारीगर सूखे मौसम में, जब पानी का स्तर कम होता है, काम शुरू करते हैं। वे किनारों से रेत और बजरी इकट्ठा करते हैं। फिर लकड़ी के विशेष औजारों से पानी में धोकर छानते हैं। अगर चमकदार कण दिखें, तो आगे प्रक्रिया चलती है। एक दिन में कुछ मिलीग्राम से एक दो ग्राम सोना मिल सकता है।
जब काम कम हो, तो वे गंगा या सतलुज जैसी बड़ी नदियों की ओर रुख करते हैं। वहां दो महीने तक रहकर काम करते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि यह विधि पर्यावरण अनुकूल है, लेकिन ज्यादा खोदाई से नदी का संतुलन बिगड़ सकता है।












