Inspirational Teachers story, अम्बाला न्यूज : साल 2015 की एक दोपहर, कैंट सुभाष पार्क में छात्राएं पेड़ से जामुन तोड़ रही थीं। इन्हीं में एक थी 12वीं की छात्रा नेहा प्रवीण नेहा ने देखा कि कुछ बच्चे नीचे गिरी हुई कीचड़ से सनी जामुन उठाकर खा रहे थे। पास जाकर इसका कारण पूछा। बच्चों ने मासूमियत में कहा ये तो रोज की जिंदगी है दीदी। बस यही बातें निशा के दिल को झकझोर गई।
यहीं से बच्चों को शिक्षित करने के लिए अभियान शुरू हुआ। वर्तमान में नेह्य 200 से ज्यादा जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क पढ़ा रही हैं। इनमें से हाल ही में एक लड़की का चयन आईआईटी में हुआ है।
जहां वो एआई इंजीनियरिंग करेगी। एक बच्चे का चयन सुपर-100 में तो एक ने जेईई परीक्षा पास की है। उनके पढ़ाए कई बच्चे अकाउंटेंट व इंजीनियर बन गए हैं। बता दें कि नेहा ने मास्टर ऑफ सोशल वर्क, बीएड, कंप्यूटर डिप्लोमा समेत कई कोर्स किए हुए अभी उनकी एलएलबी की हैं।
नेहा ने ड्रॉपआउट बच्चों का स्कूल में कराया दाखिला
नेहा ने कॉलेज में दाखिला लिया तो दोस्तों का ग्रुप बनाया। जो गांधी ग्राउंड में 25 बच्चों को पढ़ाने लगीं। आधार कार्ड न होने के चलते बच्चों का दाखिला नहीं हो पाया। डीसी की अनुमति के बाद अपनी आईडी पर आधार कार्ड बनवाया और सभी 25 बच्चों का दाखिला बीसी बाजार राजकीय स्कूल में कराया। नेहा ने बताया कि पिता का साया सिर से उठा तो भाई की फीस भरने में भी वह असमर्थ थे।
नेहा ने कॉलेज ड्रॉप कर डाटा एंट्री की नौकरी की। पढ़ाई भी जारी रखी। इसी बीच समझ आया कि भाई के लिए तो मैं थी, लेकिन कई ऐसे बेहतरीन बच्चे भी होते हैं जिनका कोई नहीं होता।
जो भावना उस दिन जगी, वह अब एक अभियान बन चुकी है। मौजूदा समय में वह 2 सेंटर चला रही हैं। जहां 200 से ज्यादा बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है। साथ ही 35 बच्चों को अडॉप्ट किया हुआ है, जिनका खर्च उनकी एनजीओ वहन करती है।
विजेंद्र सिंह के समर्पण से 35 कैडेट्स सेना में कार्यरत
सीनियर लेक्चरर विजेंद्र सिंह डागर ने 25 साल की नौकरी में अब तक 121 बच्चों को डॉक्टर बना दिया। लेक्चरर होने के साथ-साथ वह एनसीसी अधिकारी भी हैं। मेहनत और समर्पण के चलते उनके करीब 35 कैडेट्स सेना के क्षेत्र में सेवाएं दे रहे हैं। ये वो बच्चे थे जो आर्थिक रूप से कमजोर थे, लेकिन हौसलों में कोई कमी नहीं थी।
गुरुजी ने न सिर्फ उन्हें पढ़ाया, बल्कि अलग से स्पेशल कोचिंग भी दी, गाइड किया। हर वक्त मोटिवेट किया। डागर ने बताया कि उनके पिता फौज में थे। घर में कोई ऐसा नहीं था, जो पढ़ाई को लेकर दिशा दे सके।
उन्होंने कहा कि मैंने महसूस किया कि अगर मुझे गाइडेंस मिलती तो शायद और बेहतर कर पाता। यही कमी मैं अब किसी और बच्चे में नहीं देखना चाहता। बस यहीं से प्रेरणा मिली और ठान लिया कि बच्चों को सही रास्ता दिखाऊंगा।













