Bihar Farmer Registry: New demand for relief of hereditary farmers, know the challenges:
बिहार में खेतों को जोतने वाले मेहनती किसानों के लिए सरकार की बिहार फार्मर रजिस्ट्री (farmer registration) योजना एक बड़ा अवसर थी, लेकिन यह योजना वंशानुगत और सीमांत किसानों के लिए चुनौतियों का पहाड़ बन रही है। फार्मर रजिस्ट्री शिविरों में दस्तावेजी खामियां, फेस केवाईसी की विफलता (face KYC failure), और नेटवर्क समस्याएं (network issues) जैसे मुद्दों ने इन किसानों को सरकारी योजनाओं के लाभ (government scheme benefits) से वंचित कर दिया है।
जहां नए जमीन खरीदने वाले साधनसंपन्न लोग तेजी से रजिस्ट्री करवा रहे हैं, वहीं असल मेहनतकश किसान कागजी और तकनीकी जटिलताओं में उलझे हैं। किसान अब विशेष सहायता काउंटर (special assistance counters) और पोर्टल सुधार की मांग कर रहे हैं। आइए, इस समस्या की गहराई और इसके समाधान की दिशा को समझें।
बिहार फार्मर रजिस्ट्री: असल किसानों की राह में रोड़े Bihar Farmer Registry
बिहार में चल रहे फार्मर रजिस्ट्री शिविरों का मकसद था कि हर किसान को सरकारी योजनाओं, जैसे किसान क्रेडिट कार्ड (farmer credit card) और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM Kisan Samman Nidhi), का लाभ मिले। लेकिन वंशानुगत और सीमांत किसानों के लिए यह प्रक्रिया एक जटिल पहेली बन गई है।
मुजफ्फरपुर के किसान धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि शिविरों में सहायता और जानकारी की कमी के कारण असल खेत जोतने वाले किसान पीछे छूट रहे हैं। उनके दस्तावेजों में खाता, खेसरा संख्या, रकबा (land area), रैयत का नाम, और अभिभावक के नाम में गलतियां आम हैं। सकरा के राजीव कुमार और मीनापुर के मुन्ना कुमार जैसे किसानों का कहना है कि 80% से अधिक दस्तावेजों में अधूरी या गलत जानकारी के कारण वे योजनाओं से वंचित हैं।
तकनीकी समस्याएं: फेस केवाईसी और नेटवर्क की बाधाएं
फार्मर रजिस्ट्री की प्रक्रिया में फेस केवाईसी की विफलता एक बड़ी रुकावट बन रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, खराब कैमरा क्वालिटी, आधार में पुरानी या धुंधली तस्वीरें, और चेहरे की स्थिति में भिन्नता के कारण सिस्टम बार-बार ऑथेंटिकेशन को अस्वीकार कर देता है।
इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर नेटवर्क कनेक्टिविटी (network issues) और लिवनेस डिटेक्शन की खामियां भी प्रक्रिया को जटिल बना रही हैं। कई किसानों को बार-बार शिविरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, जिससे उनका समय और संसाधन दोनों बर्बाद हो रहे हैं। यह स्थिति न केवल निराशाजनक है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था (rural economy) के लिए भी हानिकारक है।
दस्तावेजी खामियां: वंशानुगत किसानों की परेशानी
वंशानुगत किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती दस्तावेजों में गलतियां हैं। खाता-खेसरा संख्या, भूमि क्षेत्रफल, और मालिकाना हक से जुड़े विवरणों में त्रुटियां उन्हें सरकारी योजनाओं से दूर रख रही हैं। उदाहरण के लिए, कई किसानों के दस्तावेजों में उनके पिता या दादा का नाम गलत दर्ज है, जिसके कारण वे किसान क्रेडिट कार्ड या फसल बीमा (crop insurance) जैसी सुविधाओं का लाभ नहीं ले पा रहे।
यह समस्या विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए गंभीर है, जो पहले ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। इन किसानों का कहना है कि अगर दस्तावेजों को ठीक करने के लिए विशेष सहायता काउंटर उपलब्ध हों, तो उनकी परेशानियां काफी हद तक कम हो सकती हैं।
किसानों की मांग: विशेष सहायता और पोर्टल सुधार
किसानों ने सरकार से मांग की है कि फार्मर रजिस्ट्री शिविरों में विशेष सहायता काउंटर स्थापित किए जाएं, जहां दस्तावेजों की गलतियों को ठीक करने में मदद मिले।
साथ ही, वे चाहते हैं कि फार्मर रजिस्ट्री पोर्टल (farmer registry portal) में रसीद और पृष्ठ संख्या के आधार पर सर्च करने का विकल्प जोड़ा जाए, ताकि प्रक्रिया सरल हो। तकनीकी विशेषज्ञों का सुझाव है कि फेस केवाईसी प्रक्रिया को और प्रभावी बनाने के लिए बेहतर कैमरे और नेटवर्क सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। ये सुधार न केवल रजिस्ट्री प्रक्रिया को तेज करेंगे, बल्कि वंशानुगत और सीमांत किसानों को भी मुख्यधारा में लाएंगे।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
बिहार फार्मर रजिस्ट्री की ये कमियां न केवल किसानों को सरकारी योजनाओं से वंचित कर रही हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रही हैं। जब असल मेहनतकश किसान योजनाओं से बाहर रहते हैं, तो इसका असर उनकी आय, फसल उत्पादन, और जीवन स्तर पर पड़ता है।
यह स्थिति सामाजिक असमानता (social inequality) को और बढ़ा सकती है, क्योंकि साधनसंपन्न लोग आसानी से रजिस्ट्री करवा रहे हैं। सरकार को इस असमानता को दूर करने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे, ताकि छोटे और सीमांत किसान भी योजनाओं का लाभ उठा सकें।
भविष्य की राह: समाधान की उम्मीद
किसानों और विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और तकनीकी एजेंसियों को मिलकर इन समस्याओं का समाधान करना होगा। विशेष सहायता काउंटर, बेहतर तकनीकी बुनियादी ढांचा, और सरल पोर्टल सुधार जैसे कदम इस दिशा में कारगर हो सकते हैं।
अगर ये सुधार लागू हो जाएं, तो बिहार के लाखों वंशानुगत और सीमांत किसान सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकेंगे। यह न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा, बल्कि बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा देगा।













