New Wheat Varieties नई दिल्ली | मध्य प्रदेश के कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं की ऐसी उन्नत किस्में विकसित की हैं, जो कम पानी में भी बंपर पैदावार दे रही हैं। अगर किसान इन नई किस्मों को अपनाएं, तो वे प्रति हेक्टेयर 80 क्विंटल तक की उपज हासिल कर सकते हैं।
रबी सीजन में गेहूं की खेती किसानों की आय का बड़ा जरिया है, और मध्य प्रदेश देश के प्रमुख गेहूं उत्पादन केंद्रों में से एक है। यहाँ से गेहूं न सिर्फ देशभर में, बल्कि विदेशों तक पहुंचता है। आइए, इन नई किस्मों और उनकी खासियतों को आसान भाषा में समझते हैं।
गेहूं की बुवाई का सही समय New Wheat Varieties
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि 10 से 30 नवंबर तक का समय गेहूं की बुवाई के लिए सबसे अच्छा है। अगर इस दौरान किसान सही बीज चुनें और उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करें, तो वे प्रति हेक्टेयर 65 क्विंटल तक की उपज पा सकते हैं। सही समय और तकनीक से बुवाई करने पर नई किस्में और भी बेहतर परिणाम दे सकती हैं।
कम पानी में भी बंपर पैदावार
किसानों को दो तरह से बांटा जा सकता है। पहले वे, जिनके पास पानी की कमी है और सिंचाई की सुविधा सीमित है। दूसरे वे, जिनके खेतों में पानी की अच्छी व्यवस्था है।
कम पानी वाले किसानों के लिए HI 1544 और JW 322 जैसी उन्नत किस्में वरदान हैं। ये किस्में न सिर्फ ज्यादा उत्पादन देती हैं, बल्कि उनके पौधे मजबूत होते हैं और रोगों से लड़ने में सक्षम हैं।
115-125 दिनों में तैयार फसल
अगर किसान कम समय में फसल तैयार करना चाहते हैं, तो JW 3465, JW 3382, HI 1650, HI 1655 और HI 1665 जैसी नई किस्में बेस्ट हैं। इनकी बुवाई 40 किलो प्रति एकड़ की दर से की जाती है। ये फसलें 115 से 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं और अच्छी देखभाल के साथ प्रति हेक्टेयर 80 क्विंटल तक की उपज दे सकती हैं।
इन किस्मों की खास बातें
इन उन्नत गेहूं किस्मों को खास तौर पर सिंचित क्षेत्रों के लिए बनाया गया है। इनकी खासियतें इस प्रकार हैं:
ज्यादा उपज: पानी की अच्छी उपलब्धता होने पर ये किस्में बंपर उत्पादन देती हैं।
रोगों से सुरक्षा: ये फसलें कई आम बीमारियों से बची रहती हैं।
तेज विकास: पौधे जल्दी बढ़ते हैं और समय पर कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं।
बाजार में अच्छा दाम: इनसे मिलने वाली फसल की गुणवत्ता शानदार होती है, जिससे मंडी में बेहतर कीमत मिलती है।
उर्वरकों का सही उपयोग
इन किस्मों की बुवाई के लिए बीज की मात्रा 40 किलो प्रति एकड़ से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। DAP, यूरिया और पोटाश जैसे उर्वरकों का संतुलित उपयोग जरूरी है। ज्यादा उर्वरक फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। साथ ही, समय-समय पर सिंचाई और निराई-गुड़ाई से फसल की ग्रोथ और उत्पादन बेहतर होगा।












