नीट पीजी 2025 की कटऑफ माइनस 40 करने के फैसले का डीएमए इंडिया ने विरोध किया है। संगठन ने इसे मेरिट के खिलाफ बताते हुए स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से हस्तक्षेप की मांग की है।
रोहतक. देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में से एक नीट पीजी 2025 इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन यानी एनबीई ने हाल ही में पीजी कोर्सेस में एडमिशन के लिए कटऑफ को घटाकर अभूतपूर्व रूप से माइनस 40 अंक कर दिया है।
इस फैसले ने मेडिकल जगत में भूचाल ला दिया है। डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए इंडिया) ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे मेधावी छात्रों के साथ अन्याय बताया है। संगठन का कहना है कि यह फैसला चिकित्सा शिक्षा के स्तर को गिराने वाला है।
अब मेरिट नहीं पैसे का बोलबाला
डीएमए इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ अमित व्यास ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि नीट पीजी हमेशा से ज्ञान और कड़ी मेहनत का प्रतीक रही है लेकिन माइनस 40 कटऑफ ने इसकी गरिमा को धूमिल कर दिया है। डॉ व्यास ने इसे ‘सीट सेल मॉडल’ करार दिया है। उनका तर्क है कि अगर किसी छात्र के पास 2 से 3 करोड़ रुपये हैं तो वह माइनस नंबर लाकर भी मैनेजमेंट कोटे की सीट खरीद सकता है और स्पेशलिस्ट डॉक्टर बन सकता है।
स्वास्थ्य मंत्री को लिखा पत्र
मामले की गंभीरता को देखते हुए डीएमए इंडिया के पदाधिकारियों ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखा है। पत्र में डॉ अमित व्यास, डॉ शुभ प्रताप सोलंकी और डॉ भानु कुमार ने मंत्री से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा है कि यह फैसला वापस लिया जाना चाहिए क्योंकि यह संदेश दे रहा है कि परीक्षा में सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराना ही काफी है योग्यता का अब कोई मोल नहीं बचा है।
मरीजों की जान को खतरा
मेडिकल विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का दूरगामी परिणाम मरीजों की सुरक्षा पर पड़ेगा। संगठन ने चिंता जताई है कि जो छात्र प्रवेश परीक्षा में शून्य या उससे भी कम अंक ला रहे हैं वे भविष्य में किस तरह के डॉक्टर बनेंगे यह सोचने वाली बात है। इससे निजी मेडिकल कॉलेजों को तो फायदा होगा और उनकी खाली सीटें भर जाएंगी लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा सकती है।
डीएमए इंडिया की तीन बड़ी मांगें
डॉक्टर्स के इस संगठन ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं ताकि मेडिकल शिक्षा की साख बचाई जा सके।
नीट पीजी 2025 के लिए निर्धारित की गई माइनस 40 की संशोधित कटऑफ को तुरंत प्रभाव से वापस लिया जाए।
स्वास्थ्य मंत्रालय, एनएमसी और एनबीई को मिलकर एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति का गठन करना चाहिए जो इस तरह के फैसलों की समीक्षा करे।
भविष्य में किसी भी बड़े नीतिगत बदलाव से पहले सभी हितधारकों और मेडिकल संगठनों से पारदर्शी तरीके से सलाह मशविरा किया जाना अनिवार्य हो।
सिस्टम पर उठाए गंभीर सवाल
संगठन ने व्यंग्य करते हुए कहा कि नई व्यवस्था में अब प्रश्न हल करना जरूरी नहीं रह गया है और रैंक महज एक दिखावा बनकर रह गई है। यह फैसला उन हजारों छात्रों के मनोबल को तोड़ने वाला है जो दिन रात एक करके पढ़ाई करते हैं और अच्छे नंबर लाकर भी सरकारी सीट से वंचित रह जाते हैं। अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य मंत्रालय इस विरोध के बाद क्या कदम उठाता है।











