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Punjab-Haryana High Court: नसबंदी विफलता को मेडिकल लापरवाही नहीं माना, मुआवजा रद्द

On: अप्रैल 19, 2025 11:48 पूर्वाह्न
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Punjab-Haryana High Court: नसबंदी विफलता को मेडिकल लापरवाही नहीं माना, मुआवजा रद्द
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Punjab-Haryana High Court Sterilization failure not considered medical negligence: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए हरियाणा के एक दंपती को मिला मुआवजा रद्द कर दिया। यह मामला नसबंदी के विफल होने से जुड़ा था, जिसके बाद दंपती को एक बच्ची हुई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मेडिकल लापरवाही नहीं, बल्कि दंपती द्वारा सावधानी न बरतने का परिणाम था। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से अहम है, बल्कि सामाजिक और चिकित्सीय मुद्दों पर भी नई रोशनी डालता है। आइए, इस मामले को विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि कोर्ट ने यह फैसला क्यों लिया।

नसबंदी विफलता का मामला: क्या थी कहानी? Punjab-Haryana High Court

हरियाणा के राम सिंह और शारदा रानी की शादी 1977 में हुई थी। 1986 तक उनके चार बच्चे हो चुके थे। परिवार नियोजन के लिए राम सिंह ने 9 अगस्त 1986 को पिहोवा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में नसबंदी करवाई। डॉक्टरों ने उन्हें ऑपरेशन के बाद कुछ सावधानियां बरतने की सलाह दी थी। दंपती ने दावा किया कि उन्होंने तीन महीने तक इंतजार किया, लेकिन इसके बावजूद शारदा रानी गर्भवती हो गईं। डॉक्टरों ने पुष्टि की कि नसबंदी विफल हो गई, और दंपती को उनकी पांचवीं बेटी हुई। इस घटना से परेशान दंपती ने इसे डॉक्टरों की लापरवाही बताते हुए मुआवजे की मांग की।

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निचली अदालत से हाई कोर्ट तक का सफर

दंपती ने कुरुक्षेत्र की स्थानीय अदालत में याचिका दायर की, जिसमें डॉक्टरों की लापरवाही के कारण मानसिक आघात का हवाला दिया। 15 जून 2001 को कुरुक्षेत्र के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने उनकी याचिका स्वीकार कर हरियाणा सरकार को 1 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। हालांकि, हरियाणा सरकार ने इस फैसले को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में चुनौती दी। सरकार की दलील थी कि नसबंदी के बाद दंपती को दी गई सावधानियों का पालन नहीं किया गया। साथ ही, राम सिंह ने ऑपरेशन के समय लिखित में दिया था कि विफलता के लिए डॉक्टर जिम्मेदार नहीं होंगे।

हाई कोर्ट का फैसला: सावधानी की कमी, लापरवाही नहीं

जस्टिस निधि गुप्ता की बेंच ने हरियाणा सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए मुआवजा रद्द कर दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि नसबंदी की विफलता प्राकृतिक कारणों से हो सकती है, और इसकी दर 0.3% से 9% तक होती है। दंपती इस दायरे में आते हैं। कोर्ट ने यह भी बताया कि गर्भावस्था के 20 सप्ताह के भीतर इसे समाप्त करने का विकल्प था, जिसका दंपती ने उपयोग नहीं किया। मेडिकल जांच से यह भी साबित हुआ कि जन्मी बच्ची दंपती की ही बेटी है, इसलिए सामाजिक कलंक का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने माना कि दंपती यह साबित नहीं कर सके कि उनकी ओर से कोई लापरवाही नहीं हुई।

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सामाजिक और चिकित्सीय पहलू

दंपती ने तर्क दिया था कि नसबंदी की विफलता के कारण पत्नी को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ा। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि बच्ची उनके परिवार का हिस्सा है, और इसमें कोई सामाजिक बहिष्कार का सवाल नहीं उठता। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि नसबंदी की विफलता दुर्लभ है, लेकिन यह पूरी तरह असंभव नहीं है। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि नसबंदी के बाद दी गई चिकित्सीय सलाह का पालन करना कितना जरूरी है।

यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का यह फैसला नसबंदी और मेडिकल प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों में एक मिसाल कायम करता है। यह आम लोगों को यह समझने में मदद करता है कि चिकित्सीय प्रक्रियाओं में विफलता हमेशा लापरवाही का परिणाम नहीं होती। साथ ही, यह डॉक्टरों और मरीजों दोनों को सावधानी बरतने की जिम्मेदारी याद दिलाता है। अगर आप नसबंदी या ऐसी किसी प्रक्रिया पर विचार कर रहे हैं, तो डॉक्टर की सलाह को गंभीरता से लें और सभी दिशा-निर्देशों का पालन करें।

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आम लोगों के लिए सुझाव

नसबंदी जैसी प्रक्रियाओं के बाद डॉक्टरों की सलाह का पालन करें और नियमित जांच करवाएं। अगर कोई समस्या हो, तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। इस तरह के मामलों में कानूनी कदम उठाने से पहले तथ्यों की पूरी जांच करें, ताकि आप सही दिशा में आगे बढ़ सकें।

अमनदीप सिंह

अमनदीप सिंह एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 10 वर्षों से मौसम और कृषि से संबंधित खबरों पर गहन और जानकारीपूर्ण लेख लिख रहे हैं। उनकी स्टोरीज़ मौसम के पूर्वानुमान, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और कृषि क्षेत्र की नवीनतम तकनीकों, योजनाओं और चुनौतियों को उजागर करती हैं, जो किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। अमनदीप का लेखन सरल, विश्वसनीय और पाठक-केंद्रित है, जो कृषि समुदाय को बेहतर निर्णय लेने में मदद करता है।

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