Chhath Puja Songs 2025 sharda sinha chhath ke geet: छठ पूजा 2025 में शारदा सिन्हा के लोकगीतों से सजाएं उत्सव! “केरवा से फलेला” जैसे गीतों में बस्ती है भक्ति। जानें छठ के गीतों की खासियत।
Chhath Puja Songs Highlights:
1. छठ पूजा के गीतों में बस्ती है प्रकृति और भक्ति की कहानी।
2. शारदा सिन्हा के गीत हर घर में छठ का उत्साह बढ़ाते हैं।
3. व्रती महिलाएं गीतों से बांधती हैं अपनी उम्मीदें और दुआएं।
छठ पूजा अब सिर्फ बिहार या पूर्वांचल का पर्व नहीं, बल्कि ये पूरी दुनिया में धूम मचाता है। दुनिया के किसी भी कोने में बसे बिहार और पूर्वांचल के लोग बड़े उत्साह और सम्मान के साथ छठी मइया की पूजा करते हैं। जैसे ही ये पर्व नजदीक आता है, गांव की गलियां, तालाबों के किनारे, मिट्टी के आंगन और नदी के घाट एक अनोखी लोकधुन से गूंज उठते हैं।
छठ के गीत: आत्मा को छूने वाली धुन
छठ पूजा में कोई शोर-शराबा या लाउडस्पीकर की आवाज नहीं होती। यहां मां और बहनें धीमे-धीमे गाती हैं, “केरवा से फलेला घेवद से…”। इन गीतों में न तो किसी देवता का औपचारिक नाम होता है, न ही वेद-मंत्रों की भारी-भरकम शब्दावली। फिर भी ये गीत एक पूरा ब्रह्मांड समेटे हुए हैं—जल, जंगल, प्रकृति और मातृभाव। छठ के लोकगीत, जैसे शारदा सिन्हा के गाए “हे छठी मइया, तोहार महिमा अपार…”, भक्ति को सुरों में पिरोते हैं। ये गीत पीढ़ियों से चले आ रहे हैं, जो हर घर में मां की गोद से सीखे जाते हैं।
प्रकृति और भक्ति का अनोखा संगम
छठ पूजा का व्रत सिर्फ नियम और संकल्प का नहीं, बल्कि प्रकृति और पूर्वजों से संवाद का पर्व है। जब व्रती महिलाएं गाती हैं, “गंगा मइया तोहार आरती उतारब…”, तो गंगा कोई नदी नहीं, बल्कि एक मां बन जाती हैं। इन गीतों में नदी को बहन, सूरज को भाई और सांझ को थका हुआ यात्री कहा जाता है। ये लोकगीत प्रकृति को इंसान का रूप देकर उसे और करीब लाते हैं। ये बताते हैं कि पूजा मंदिरों तक सीमित नहीं, इसे खेत की मेड़ पर भी किया जा सकता है।
Chhath Puja Songs: गीतों में बस्ता है दर्द और धैर्य
छठ के गीतों में औरतों का दर्द, उनकी उम्मीदें और उनका धैर्य झलकता है। कई बार गीतों में हल्का-सा ताना भी होता है, जैसे “तू त आन्हर हुईहे रे बटोहिया, इ दल तोरा न बुझाए।” ये कोई मंत्र नहीं, लेकिन इससे गहरी प्रार्थना क्या हो सकती है? जब लकड़ी के चूल्हे पर ठेकुआ पकता है और आंगन में धुआं घुलता है, तब इन गीतों में पूरा घर समा जाता है। ये गीत बताते हैं कि छठ की व्रती सिर्फ पूजा नहीं करती, वह इस पर्व की कवयित्री भी है।
हर घर में अलग, फिर भी एक जैसी धुन
छठ के गीतों की खास बात ये है कि ये हर घर और गांव में अलग-अलग होते हैं। कोई मां बेटी की शादी की चिंता को इनमें पिरोती है, तो कोई बेटे की नौकरी की दुआ मांगती है। शहरों में भी छठ का जादू कम नहीं होता। भले ही वहां घास की जगह तारपॉल हो या अस्थायी घाट बनें, लेकिन जब कोई व्रती “उठ ए सूरज मल, कर अरघ स्वीकार…” गाती है, तो पूरा माहौल गांव जैसा हो जाता है। ये गीत सदियों पुरानी विरासत को एक सांस में समेट लेते हैं।
भक्ति जो बाजार से नहीं खरीदी जा सकती
आज के दौर में जब त्योहारों में बाजार हावी हो गया है, छठ के गीत हमें याद दिलाते हैं कि कुछ पर्व पैसे से नहीं खरीदे जा सकते। छठ पूजा में कोई मूर्ति नहीं होती, लेकिन भक्ति का सबसे सजीव रूप यहीं दिखता है। न फूलों का ढेर, न घंटों की गूंज, बस मिट्टी, जल और इन गीतों का संगम। जब सूर्योदय के समय व्रती मां “कब उगिहें चकवा कब मारब फकवा” गाती है, तो वह सिर्फ अरघ की प्रतीक्षा नहीं करती, बल्कि अपनी तपस्या का एहसास भी कराती है।













