दुनिया भर में हर साल करोड़ों लोग अपने स्मार्टफोन को 2 से 5 साल इस्तेमाल करने के बाद बदल देते हैं। अलमारियों और दराजों में बेकार पड़े रहने वाले ये पुराने हैंडसेट पर्यावरण के लिए भारी मुसीबत यानी ई-वेस्ट बन जाते हैं। टेक दिग्गज गूगल ने अब इन बेकार हो चुके स्मार्टफोन्स को एक नई और बेहद उपयोगी जिंदगी देने का फैसला किया है। गूगल ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो (UCSD) के शोधकर्ताओं के साथ हाथ मिलाकर एक बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया है, जिसके तहत पुराने मोबाइलों को मिलाकर एक मिनी डेटा सेंटर बनाया जा रहा है।
फोन क्लस्टर कंप्यूटिंग क्या है और यह कैसे काम करती है?
गूगल ने इस नई तकनीक को “फोन क्लस्टर कंप्यूटिंग” नाम दिया है, जिसका सीधा मकसद पुराने मोबाइल के मुख्य अंदरूनी हिस्सों को दोबारा इस्तेमाल में लाना है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले फोन के उन हिस्सों को हटा दिया जाता है जिनकी सर्वर को जरूरत नहीं होती, जैसे डिस्प्ले, बैटरी, कैमरा और बाहरी बॉडी। इसके बाद केवल फोन का मुख्य सर्किट यानी मदरबोर्ड बचता है, जिसमें प्रोसेसर, रैम (Memory) और स्टोरेज मौजूद होते हैं। इन सभी मदरबोर्ड्स को आपस में जोड़कर लिनक्स (Linux) आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलाया जाता है, जिससे यह पूरा ढांचा एक सुपर-नेटवर्क की तरह काम करने लगता है।
क्या पुराना स्मार्टफोन वाकई एक आधुनिक डेटा सर्वर की जगह ले सकता है?
गूगल की शुरुआती रिसर्च से बेहद हैरान करने वाले नतीजे सामने आए हैं, जो बताते हैं कि मात्र 25 से 50 पुराने स्मार्टफोन मिलकर कुछ खास तरह के डेटा ऑपरेशन्स में एक आधुनिक सर्वर जैसी ताकत दे सकते हैं। जब हजारों मोबाइलों को एक साथ जोड़ा जाएगा, तो वे भारी-भरकम क्लाउड सेवाओं और वैज्ञानिक रिसर्च वर्कलोड को संभालने में सक्षम हो जाएंगे। इन बिखरे हुए डिवाइसेज को नियंत्रित करने के लिए ‘Kubernetes’ जैसे आधुनिक सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म की मदद ली जा रही है, जिसका इस्तेमाल मौजूदा समय में दुनिया के सबसे बड़े क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर को मैनेज करने के लिए किया जाता है। हरियाणा न्यूज़ पोस्ट पर ये भी पढ़ें: बाबा नीम करोली के कैंची धाम का स्थापना दिवस 15 जून को, नोट कर लें सुबह और शाम की आरती का टाइमिंग
2,000 गूगल पिक्सल फोन के साथ अगला बड़ा प्रयोग क्या है?
इस प्रोजेक्ट को बड़े पैमाने पर टेस्ट करने के लिए वैज्ञानिकों ने अब 2,000 पुराने गूगल पिक्सल स्मार्टफोन को एक साथ जोड़कर एक विशाल कंप्यूटिंग क्लस्टर बनाने का लक्ष्य रखा है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो के प्रोफेसर और शोधकर्ता इस क्लस्टर का उपयोग सिस्टम्स प्रोग्रामिंग और पैरलल कंप्यूटिंग जैसे एडवांस कोर्सेज की पढ़ाई के लिए करेंगे। इस प्रयोग से वैज्ञानिक यह सटीक डेटा जुटाना चाहते हैं कि रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले ये छोटे डिवाइस एक कड़े कमर्शियल डेटा सेंटर जैसे माहौल में लगातार चलने पर कैसा प्रदर्शन करते हैं।
इस तकनीक का आम आदमी और पर्यावरण पर क्या असर होगा?
इस प्रोजेक्ट की सफलता सीधे तौर पर आम उपभोक्ताओं और ग्लोबल टेक इंफ्रास्ट्रक्चर को प्रभावित करेगी। नए सर्वर बनाने में भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है और महंगे खनिजों की जरूरत पड़ती है, जिस पर इस रीसाइक्लिंग तकनीक से रोक लगेगी। आम आदमी के नजरिए से देखें तो जब क्लाउड स्टोरेज और इंटरनेट डेटा संभालने की लागत घटेगी, तो आने वाले समय में क्लाउड सर्विसेज और ऑनलाइन स्टोरेज प्लान्स काफी सस्ते हो सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि घर में कबाड़ बन चुके फोन को फेंकने के बजाय उसे एक मूल्यवान कंप्यूटिंग संसाधन के रूप में बेचा या रीसायकल किया जा सकेगा।











