अंबाला, 29 अप्रैल (हरियाणा न्यूज पोस्ट)। आज के दौर में भले ही साइकिल चलाने के लिए किसी सरकारी कागज की जरूरत न पड़ती हो, लेकिन 1940 के दशक में स्थिति बिल्कुल अलग थी। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही जानकारी के मुताबिक, उस दौर में साइकिल रखना एक बड़ा ‘स्टेटस सिंबल’ माना जाता था। ब्रिटिश काल के दौरान और आजादी मिलने के कुछ सालों बाद तक भारत के अधिकांश शहरों, कस्बों और गांवों में साइकिल चलाने के लिए लाइसेंस लेना कानूनी रूप से अनिवार्य था। यह अनुमति स्थानीय नगर पालिका, पंचायत समिति या कैंटोनमेंट बोर्ड द्वारा दी जाती थी।
2 रुपये की फीस और पीतल का खास ‘टैग’
इस ऐतिहासिक व्यवस्था के तहत साइकिल मालिकों को हर साल अपना लाइसेंस रिन्यू कराना पड़ता था। उस समय एक साल के लाइसेंस की कीमत 2 रुपये तय की गई थी, जिसकी वैल्यू आज के मुकाबले काफी अधिक थी।
Licence was required for a cycle 🤔 pic.twitter.com/RtHIliewN8
— Shekar Iyer (@SHEKARSUSHEEL) April 27, 2026
लाइसेंस मिलने के बाद प्रशासन की ओर से पीतल या एल्युमिनियम का एक छोटा सा टोकन या टैग दिया जाता था। इस टैग को साइकिल की हेड ट्यूब या फ्रेम पर प्रमुखता से लगाना होता था ताकि चेकिंग के दौरान अधिकारी इसे आसानी से देख सकें।
रात में लाइट और बिना लाइसेंस पर एक्शन
उस दौर में यातायात के नियम आज की तरह ही सख्त थे। अगर कोई व्यक्ति बिना लाइसेंस के साइकिल चलाते हुए पकड़ा जाता था, तो स्थानीय निकाय के कर्मचारी तुरंत जुर्माना वसूलते थे। नियमों के मुताबिक, रात के समय साइकिल पर हेडलाइट या लैंप लगाना अनिवार्य था। सुरक्षा के इस मानक को पूरा न करने पर व्यक्ति को लाइसेंस जारी नहीं किया जाता था। 1940 के दशक में साइकिल को एक ‘लग्जरी वस्तु’ की श्रेणी में रखा जाता था, लेकिन जैसे-जैसे मोटर वाहनों का चलन बढ़ा, प्रशासन का ध्यान बड़े वाहनों की ओर शिफ्ट हो गया और साइकिल को इन पाबंदियों से मुक्त कर दिया गया।
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