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पहली सिंचाई के बाद गेहूं में रोगों का खतरा, समय पर निगरानी जरूरी

On: January 3, 2026 8:10 AM
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पहली सिंचाई के बाद गेहूं में रोगों का खतरा, समय पर निगरानी जरूरी
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रबी सीजन में उत्तर भारत के किसानों के लिए गेहूं सबसे अहम फसल है। बुवाई के करीब तीन से चार हफ्ते बाद की पहली सिंचाई फसल की बढ़वार के लिए बेहद जरूरी होती है। इसी चरण को कृषि वैज्ञानिक ताज मूल अवस्था या सीआरआई स्टेज कहते हैं।
लेकिन यही वह समय है जब खेत में नमी बढ़ने और तापमान में बदलाव के कारण गेहूं की फसल पर कई फफूंदजनित रोग तेजी से पनपने लगते हैं।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, अगर इस दौर में खेत की नियमित जांच न की जाए, तो उपज में 20 से 40 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।

क्यों बढ़ जाता है रोगों का खतरा

पहली सिंचाई के बाद खेत में नमी अचानक बढ़ जाती है। घनी फसल के बीच हवा का प्रवाह कम हो जाता है और तापमान मध्यम बना रहता है।
डॉ. एस के सिंह, पौध संरक्षण विशेषज्ञ बताते हैं कि यह माहौल खासतौर पर इन बीमारियों के लिए अनुकूल होता है

  • पीला रस्ट

  • भूरा रस्ट

  • पत्ती झुलसा

  • जड़ सड़न

इन रोगों का असर सीधे पौधों की भोजन बनाने की क्षमता पर पड़ता है, जिससे दाने कमजोर, छोटे और सिकुड़े हुए रह जाते हैं।

पीला रस्ट और पत्ती झुलसा की पहचान कैसे करें

पीला रस्ट के लक्षण

  • पत्तियों पर हल्दी जैसे पीले चूर्ण की धारियां

  • तेजी से फैलने वाला संक्रमण

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  • ठंड और नमी में ज्यादा सक्रिय

पत्ती झुलसा के लक्षण

  • पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे

  • पत्तियों का समय से पहले सूखना

  • पौधों की बढ़वार रुक जाना

विशेषज्ञ मानते हैं कि शुरुआती पहचान से इलाज आसान और सस्ता हो जाता है।

पहली सिंचाई के 7 से 10 दिन बाद खेत का निरीक्षण जरूरी

किसानों को सलाह दी जाती है कि पहली सिंचाई के एक हफ्ते बाद खेत का पूरा चक्कर जरूर लगाएं
इन बातों पर खास ध्यान दें

  • पत्तियों पर पीली या भूरी धारियां

  • छोटे काले या भूरे धब्बे

  • पौधों का पीला पड़ना

  • कमजोर तने या सूखती पत्तियां

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अगर ये संकेत दिखें, तो समझ लें कि बीमारी की शुरुआत हो चुकी है।

जलभराव और ज्यादा पानी से बचें

खेत में पानी रुकना गेहूं की फसल के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं

  • हल्की लेकिन जरूरत के अनुसार सिंचाई करें

  • भारी मिट्टी में सिंचाई का अंतर बढ़ाएं

  • खेत की जल निकासी व्यवस्था ठीक रखें

जलभराव से न केवल रोग बढ़ते हैं, बल्कि जड़ों को भी नुकसान पहुंचता है।

संतुलित खाद से बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता

केवल यूरिया पर निर्भर रहना फसल को कमजोर बना देता है।
डॉ. सिंह के अनुसार, गेहूं को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है

  • नाइट्रोजन के साथ फास्फोरस और पोटाश का संतुलन

  • जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का उपयोग

  • पोटाश से पौधों की बाहरी कोशिकाएं मजबूत होती हैं

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मजबूत पौधे रोगों का बेहतर मुकाबला कर पाते हैं।

जैविक और रासायनिक दोनों तरीकों से सुरक्षा

रोकथाम के लिए

  • सीवीड आधारित जैव खाद से पौधों की अंदरूनी ताकत बढ़ती है

  • ट्राइकोडर्मा से बीज और मिट्टी उपचार रोगों का खतरा कम करता है

संक्रमण बढ़ने पर

अगर मौसम में अचानक ठंड या ज्यादा नमी के कारण रोग तेजी से फैलें, तो वैज्ञानिक सलाह से दवा का प्रयोग करें

  • पीला रस्ट के लिए प्रोपिकोनाजोल

  • पत्ती झुलसा के लिए मैंकोजेब

सही मात्रा और सही समय पर छिड़काव से बीमारी पर तुरंत नियंत्रण पाया जा सकता है।

जलवायु में बदलाव और अनियमित मौसम के कारण गेहूं की बीमारियां हर साल किसानों के लिए नई चुनौती बन रही हैं।
समय पर निगरानी, संतुलित खाद और सही सिंचाई प्रबंधन अपनाकर किसान न केवल उत्पादन बचा सकते हैं, बल्कि लागत भी कम कर सकते हैं।

अमनदीप सिंह

अमनदीप सिंह एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 10 वर्षों से मौसम और कृषि से संबंधित खबरों पर गहन और जानकारीपूर्ण लेख लिख रहे हैं। उनकी स्टोरीज़ मौसम के पूर्वानुमान, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और कृषि क्षेत्र की नवीनतम तकनीकों, योजनाओं और चुनौतियों को उजागर करती हैं, जो किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। अमनदीप का लेखन सरल, विश्वसनीय और पाठक-केंद्रित है, जो कृषि समुदाय को बेहतर निर्णय लेने में मदद करता है।

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