मेरठ, 22 अप्रैल (हरियाणा न्यूज पोस्ट)। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, बागपत और मुजफ्फरनगर जैसे बेल्ट में किसान दशकों से गेहूं, धान और गन्ना की खेती पर निर्भर रहे हैं। लेकिन अब सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने खेती की तस्वीर बदलने की तैयारी कर ली है। कुलपति डॉक्टर के.के. सिंह के दिशा-निर्देश में विश्वविद्यालय के हॉर्टिकल्चर कॉलेज ने ‘ड्रैगन फ्रूट’ यानी कमलम की खेती का सफल प्रदर्शन प्रोजेक्ट शुरू किया है। प्राध्यापक डॉक्टर अरविंद राणा द्वारा लगाए गए इस प्रोजेक्ट का मकसद स्थानीय किसानों को पारंपरिक फसलों के चक्र से बाहर निकालकर लाखों की आय वाले इस ‘सुपरफ्रूट’ की ओर मोड़ना है।
एक एकड़ में ₹24 लाख की कमाई: मुनाफे का पूरा गणित समझिए
ड्रैगन फ्रूट की खेती को ’21वीं सदी का चमत्कारिक फल’ कहा जाता है। प्रति एकड़ इसकी पैदावार 5 से 12 टन तक हो सकती है। बाजार में इसके दाम ₹100 से ₹200 प्रति किलो के बीच रहते हैं, जिससे किसान एक एकड़ से ₹8 लाख से ₹24 लाख तक का राजस्व प्राप्त कर सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक पौधे से साल में 3-4 बार फल मिलते हैं और एक पौधा 50 से 120 फल तक दे सकता है। कैक्टस प्रजाति का होने के कारण इसमें कीट और रोगों का खतरा न के बराबर है, जिससे कीटनाशकों पर होने वाला खर्च बच जाता है।
आयात पर निर्भर भारत: किसानों के पास बड़ा मौका
भारत में ड्रैगन फ्रूट की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन घरेलू उत्पादन अब भी मांग के मुकाबले काफी कम है। वर्तमान में देश में केवल 3,000 हेक्टेयर भूमि पर ही इसकी खेती हो रही है, जिसके कारण अधिकांश फल थाईलैंड, वियतनाम और मलेशिया से आयात करना पड़ता है। सरकार अब ‘कमलम’ की खेती को बढ़ावा देने के लिए उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) स्थापित कर रही है। हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसान विश्वविद्यालय के प्रदर्शन फार्म को देखकर तकनीकी ज्ञान हासिल कर सकते हैं और अपनी बंजर या कम उपजाऊ जमीन पर भी इसे उगाकर भारी मुनाफा कमा सकते हैं।
सेहत का खजाना और कम मेहनत की फसल
ड्रैगन फ्रूट केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि औषधीय गुणों के कारण भी दुनिया भर में पसंद किया जा रहा है। मूल रूप से मैक्सिको और मध्य अमेरिका का यह फल अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले गुणों के लिए मशहूर है। यह एक बारहमासी फसल है, जिसे कम पानी और कम रासायनिक खाद की जरूरत होती है। वियतनाम में इसे कभी राजाओं के लिए उगाया जाता था, लेकिन अब भारत का आम किसान भी केंद्र और राज्य सरकारों की मदद से इसे अपनी खुशहाली का जरिया बना सकता है।
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