असम के कामरूप जिले में एक किसान की छोटी सी पहल ने खेती-किसानी की दुनिया में बड़े बदलाव की नींव रख दी है। 45 वर्षीय किसान मिलन ज्योति दास ने गाय के गोबर और खेत के कचरे को सिर्फ खाद तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे रोजगार का साधन बना दिया है।
पिछले 14 सालों से खेती कर रहे मिलन ने एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया है, जो गोबर को मजबूत और सुंदर गमलों (बायो-पॉट) में बदल देती है। उनकी यह तकनीक प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ एक कारगर हथियार बनकर उभरी है।
बिजली का झंझट नहीं, लागत सिर्फ 1500 रुपये
मिलन ज्योति का यह आविष्कार ‘जुगाड़’ से कहीं आगे इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना है। उन्होंने एक ‘मैनुअल स्क्रू-टाइप प्रेस मशीन’ बनाई है। सबसे खास बात यह है कि इस पूरी मशीन को तैयार करने में महज 1500 रुपये का खर्च आया है। इसे चलाने के लिए न तो बिजली चाहिए और न ही डीजल-पेट्रोल।
यह मशीन पूरी तरह हाथ से ऑपरेट होती है। इसमें एक हैंडल लगा है, जिसे घुमाने पर दबाव बनता है। लोहे से बनी इस मशीन पर जंग-रोधी कोटिंग की गई है, जिससे यह सालों-साल खराब नहीं होती। गांव का कोई भी व्यक्ति इसे आसानी से ऑपरेट कर सकता है।
कैसे बनते हैं ये इको-फ्रेंडली गमले?
गमले बनाने की प्रक्रिया बेहद सरल और पूरी तरह ऑर्गेनिक है। इसके लिए गाय के गोबर में धान की भूसी और रद्दी कागज की लुगदी (पल्प) मिलाई जाती है। इस मिश्रण को मशीन के सांचे में डालकर प्रेशराइज किया जाता है, जिससे यह एक कप या गमले का आकार ले लेता है।
मशीन से निकालने के बाद इन गमलों को एक से दो दिन धूप में सुखाया जाता है। सूखने के बाद ये इतने मजबूत हो जाते हैं कि इन्हें तीन महीने तक स्टोर करके रखा जा सकता है। एक व्यक्ति इस मशीन की मदद से दिन भर में आराम से 50 से 150 गमले तैयार कर सकता है।
गमला ही बन जाता है खाद
नर्सरी में आमतौर पर पौधे काली प्लास्टिक की थैलियों में मिलते हैं। जब किसान या बागवानी के शौकीन लोग इन पौधों को जमीन में लगाते हैं, तो प्लास्टिक फाड़ते समय अक्सर पौधे की नाजुक जड़ें टूट जाती हैं। इसे ‘ट्रांसप्लांटिंग स्ट्रेस’ कहा जाता है, जिससे पौधा सूखने का डर रहता है।
मिलन के बनाए ‘बायो-पॉट’ इस समस्या का पक्का इलाज हैं। इन गमलों को प्लास्टिक की तरह हटाने की जरूरत नहीं पड़ती। आप पौधे को गमले समेत जमीन में गाड़ सकते हैं। चूंकि यह गोबर और भूसे से बना है, इसलिए मिट्टी में जाते ही यह गलना शुरू हो जाता है और जड़ों के लिए खाद का काम करता है। इससे पौधे को दोहरी ताकत मिलती है और वह तेजी से बढ़ता है।
गांवों में रोजगार का नया मॉडल
मिलन ज्योति की यह सोच ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ वाली कहावत को सच करती है। जहां एक तरफ प्लास्टिक का कचरा कम हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह कमाई का जरिया भी बन रहा है। बाजार में एक गोबर के गमले की कीमत करीब 20 रुपये तक मिल जाती है।
अगर कोई किसान दिन में 100 गमले भी बनाता है, तो वह घर बैठे अच्छी कमाई कर सकता है। शहरी इलाकों में छत पर बागवानी (टेरेस गार्डनिंग) करने वालों के बीच ऐसे ऑर्गेनिक गमलों की भारी मांग है।











