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Jind में Ahoi Ashtami 2025 का चांद किस समय दिखेगा? जानें पूजा विधि और महत्व

On: अक्टूबर 9, 2025 5:48 अपराह्न
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Jind में Ahoi Ashtami 2025 का चांद किस समय दिखेगा? जानें पूजा विधि और महत्व
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Jind mein Ahoi Ashtami 2025 ka chand kab niklega: अहोई अष्टमी हिंदू धर्म का एक ऐसा त्योहार है जो मां और बच्चों के बीच के अनमोल रिश्ते को सेलिब्रेट करता है। यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है, जहां माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए कठोर व्रत रखती हैं और अहोई माता, जो मां पार्वती का एक रूप हैं, की पूजा करती हैं। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आता है, जो दीवाली से आठ दिन पहले और करवा चौथ से चार दिन बाद होता है। यह त्योहार मातृ प्रेम, अटूट आस्था और पुरानी परंपराओं का खूबसूरत प्रतीक है।

Jind में Ahoi Ashtami 2025 का चांद किस समय दिखेगा?

अहोई अष्टमी 2025 में सोमवार, 13 अक्टूबर को मनाई जाएगी। पूजा और व्रत के लिए शुभ समय इस प्रकार है:

अष्टमी तिथि शुरू: 13 अक्टूबर, दोपहर 12:24 से

अष्टमी तिथि समाप्त: 14 अक्टूबर, सुबह 11:09 तक

पूजा मुहूर्त: शाम 5:40 से 7:19 तक (स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करें)

तारों की पूजा: शाम 6:28 से 6:45 के बीच; माताएं तारे देखने के बाद व्रत खोलती हैं (चंद्रमा नहीं)

चंद्रोदय: 14 अक्टूबर को रात 12:03 से 12:09 के बीच (व्रत खोलने से संबंधित नहीं)

ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व

अहोई अष्टमी माताओं की प्रार्थनाओं का पर्व है। इस दिन माताएं, विशेष रूप से वे जो संतान प्राप्ति की इच्छा रखती हैं, सूर्योदय से सांझ तक निर्जला व्रत रखती हैं। वे अहोई माता से अपने बच्चों को बीमारी, बाधाओं और अकाल मृत्यु से बचाने की प्रार्थना करती हैं।

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व्रत कथा

अहोई अष्टमी की व्रत कथा इस पर्व का दिल है। एक पुरानी कथा के अनुसार, एक सेठ की पत्नी ने अनजाने में मिट्टी खोदते समय एक शेर के शावक की जान ले ली। इसके परिणामस्वरूप, उसके सभी बच्चे मर गए। दुखी होकर उसने कठोर पश्चाताप किया और निर्जला व्रत रखकर अहोई माता की पूजा की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उसके बच्चों को पुनर्जनम दिया। तभी से माताएं अपने बच्चों की सलामती के लिए यह व्रत रखती हैं।

बच्चों के आशीर्वाद के लिए पूजा विधि

घर और पूजा स्थल की सफाई: घर और पूजा क्षेत्र को अच्छे से साफ करें।

अहोई माता का चित्र: दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएं या पोस्टर लगाएं, जिसमें अक्सर शेर, शावक या नेवला होता है।

पूजा थाली: स्टील या मिट्टी की थाली में दीया, करवा (जल का पात्र), सिंदूर, रोली, चावल, मिठाई और चांदी की “होई माला” (यदि उपयोग हो) सजाएं।

पूजा विधि

सुबह का संकल्प

माताएं सुबह उठकर बच्चों की सलामती के लिए निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं।

शाम की पूजा

सूर्यास्त के समय परिवार, खासकर बच्चों के साथ एकत्र हों। महिलाएं उत्सव के कपड़े, चूड़ियां, बिंदी और गहने पहनती हैं।
अहोई माता के चित्र को दीवार पर लगाएं और नीचे गेहूं के दाने रखें। प्रत्येक बच्चे के लिए चांदी की होई माला जोड़ी जाती है।
दीया जलाएं, माता के चित्र पर रोली, चावल और जल चढ़ाएं। अहोई अष्टमी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।

तारों की पूजा

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निर्धारित समय पर बाहर जाएं या खिड़की से तारे देखें।
तारों को अर्घ्य (जल, चावल या मिठाई के साथ) चढ़ाएं और बच्चों के लिए प्रार्थना करें।

प्रसाद और व्रत खोलना

प्रसाद के रूप में “पुआ” (गेहूं का तला हुआ मीठा व्यंजन या खीर) तैयार करें।
तारे देखने के बाद माताएं प्रसाद चढ़ाकर व्रत खोलती हैं और इसे बच्चों के साथ बांटती हैं, जो व्रत के पूरा होने का प्रतीक है।

पूजा सामग्री और चेकलिस्ट

अहोई माता का चित्र/पोस्टर: पूजा स्थल का केंद्र

दीया: पवित्रता का प्रतीक

गेहूं के दाने: चित्र के नीचे, उर्वरता और आशीर्वाद के लिए

रोली और चावल: तिलक और भेंट के लिए

चांदी की होई माला: प्रत्येक बच्चे के लिए पारंपरिक

पुआ/खीर/मिठाई: प्रसाद, बच्चों के साथ बांटा जाता है

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करवा (पात्र): जल चढ़ाने के लिए

सांस्कृतिक परंपराएं और रीति-रिवाज

चांदी की होई माला: कुछ परिवार प्रत्येक बच्चे के लिए चांदी की माला बनवाते या उपहार देते हैं, जिसे मां आशीर्वाद के रूप में पहनती है।
सामुदायिक कथा: महिलाएं एक साथ कथा सुनने और सामूहिक पूजा करने के लिए इकट्ठा होती हैं, जिससे बहनापा और सकारात्मकता बढ़ती है।
संतानहीन महिलाओं के लिए आशीर्वाद: यह व्रत संतान प्राप्ति और मातृत्व की बाधाओं को दूर करने के लिए शुभ माना जाता है।
क्षेत्रीय रीति-रिवाज: पंजाबी, हरियाणवी, राजस्थानी और यूपी समुदाय अपनी खास पूजा शैली और प्रसाद की रेसिपी अपनाते हैं।

अहोई अष्टमी व्रत के फायदे

बच्चों के लिए आशीर्वाद: माताएं अहोई माता से अपने बच्चों की लंबी उम्र, स्वास्थ्य, खुशी और समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।
बीमारियों से सुरक्षा: इस व्रत का आध्यात्मिक पुण्य बच्चों को रोगों और नकारात्मक शक्तियों से बचाता है।
बेहतर उर्वरता: संतान की इच्छा रखने वाली महिलाएं इस व्रत को शुभ मानती हैं।
पारिवारिक सौहार्द: यह व्रत परिवार में एकता, शांति और समृद्धि लाता है।
आध्यात्मिक अनुशासन: निर्जला व्रत मानसिक अनुशासन और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देता है।

अहोई अष्टमी व्रत कथा

यह कथा पश्चाताप, क्षमा और मातृ प्रेम से जुड़ी दैवीय कृपा को दर्शाती है। एक गांव में एक दयालु महिला के सात बच्चे थे। दीवाली से पहले घर की मरम्मत के लिए वह जंगल में मिट्टी लेने गई। अनजाने में उसने मिट्टी खोदते समय एक शेर के शावक की जान ले ली। गुस्से में शेरनी ने उसे श्राप दिया कि उसके बच्चे भी उसी तरह मर जाएंगे। इसके बाद उसके सातों बच्चे दुखद रूप से मर गए।
दुखी होकर महिला ने मार्गदर्शन मांगा और उसे अहोई अष्टमी का व्रत और अहोई माता की पूजा करने की सलाह दी गई। उसने पूरी भक्ति से व्रत रखा, जिससे उसके पाप माफ हुए और माता ने उसके बच्चों को जीवित कर दिया। तभी से माताएं यह व्रत रखती हैं।

अहोई अष्टमी मातृ भक्ति को सेलिब्रेट करता है और उर्वरता, बच्चों की सलामती और पारिवारिक कल्याण जैसे सामाजिक मूल्यों को दर्शाता है। यह पर्व सामूहिक कथा पाठ और प्रार्थनाओं के जरिए सांस्कृतिक बंधनों को मजबूत करता है। गेहूं, चांदी की माला और तारों की पूजा उर्वरता, सुरक्षा और दैवीय आशीर्वाद का प्रतीक है। यह माताओं के बीच भावनात्मक और आध्यात्मिक समर्थन को बढ़ावा देता है। आधुनिक समय में यह पर्व पुरानी परंपराओं को बनाए रखते हुए शहरी जीवनशैली में ढल गया है, जैसे कि छपे हुए चित्र और ऑनलाइन पूजा।

अमित गुप्ता

पत्रकारिता में पिछले 30 वर्षों का अनुभव। दैनिक भास्कर, अमर उजाला में पत्रकारिता की। दैनिक भास्कर में 20 वर्षों तक काम किया। अब अपने न्यूज पोर्टल हरियाणा न्यूज पोस्ट (Haryananewspost.com) पर बतौर संपादक काम कर रहा हूं। खबरों के साथ साथ हरियाणा के हर विषय पर पकड़। हरियाणा के खेत खलियान से राजनीति की चौपाल तक, हरियाणा सरकार की नीतियों के साथ साथ शहर के विकास की बात हो या हर विषयवस्तु पर लिखने की धाकड़ पकड़। म्हारा हरियाणा, जय हरियाणा।

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