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Nuh News: नूंह की बेटियों ने तोड़ी पाबंदियां! फुटबॉल मैदान में लहराया परचम!

On: August 29, 2025 9:19 PM
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Nuh News: नूंह की बेटियों ने तोड़ी पाबंदियां! फुटबॉल मैदान में लहराया परचम!
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Nuh Girls Football (नूंह ) : जहां आज भी हरियाणा का नूंह जिला लड़कियों की पढ़ाई और बाहर निकलने की आजादी पर सवालों से जूझ रहा है, वहीं यहीं की मुस्लिम बेटियां फुटबाल के जरिए नई इबारत लिख रही हैं। घर की चौखट तक सीमित रखने वाली सोच को तोड़ते हुए ये बेटियां अब मैदान में अपनी पहचान बना रही हैं। जिले के करीब पांच गांवों की 700 से अधिक बेटियां रोज फुटबाल का अभ्यास करती हैं।

इनमें से 20 लड़कियां राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा ले चुकी हैं। वो भी छोड़कर खेल के कास्ट्यूम में मैदान पर उतरकर इन बेटियों के लिए यह सफर केवल गांव से राज्य स्तर तक पहुंचने का नहीं, बल्कि सदियों पुरानी पाबंदियों को लांघने का भी है। हर किक मानो समाज को उस सोच को चुनौती देती है, जो लड़कियों को सिर्फ घर तक सीमित रखती है।

मुस्लिम बहुल क्षेत्र माने जाने वाले हमें यह बदलाव सिर्फ खेल का नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का संकेत है। आज ये बेटियां मैदान में वैहते हुए न सिर्फ अपनी पहचान बना रही हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी रास्ता खोल रही हैं।

परिवारों की सोच बदलने का भी प्रयास

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हाल ही में रोहतक में आयोजित राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में मुस्लिम बेटियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया इनमें से कई लड़कियों ने पहली बार न सिर्फ जिले से बाहर कदम रखा, बल्कि सिर से युकां हटाकर स्टेडियम तक पहुंचना उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। पढ़ाई से लेकर खेल तक का यह सफर आसान नहीं था, लेकिन इसमें सीक्विन एनजीओ ने उनका साथ दिया।

एनजीओ ने न केवल बेटियों को तैयार किया बल्कि उनके परिवारों की सोच बदलने का भी प्रयास किया। अब यह बेटियां कुरुक्षेत्र में होने वाली राज्य स्तरीय स्कूल खेल प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेंगी। खास बात यह है कि अंडर-14 और अंडर-17 दोनों टीमों में 90 प्रतिशत लड़कियां मुस्लिम समुदाय से हैं और दोनों टीमों नूंह जिले की लड़किया फुटबाल की प्रैक्टिस करते हुए सो एनजीओ सदस्य

कौसर बनीं प्रेरणा

टीम की कप्तान कौसर खुद एक मिसाल बन गई है। महज दो साल में गोलकीपर से कप्तान तक का सफर तय करने वाली कौसर पहले दुपट्टा पहनकर खेलती थीं, जिससे उन्हें परेशानी होती थी। उन्होंने परिवार को समझाया और धीरे-धीरे बदलाव आया। आज कही परिवार उनकी कामयाबी पर गर्व करता है।

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खाली प्लाट दना मैदान

एनजीओ के समीम अहमद बताते हैं कि नूंह जैसे इलाके में लड़कियों को पढ़ाई के लिए भी घर से बाहर भेजना चुनौती होता है ऐसे में उन्हें राज्य स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुंचाना किसी जीत से कम नहीं। ये कहते हैं कि ये लड़कियां किसी स्टेडियम में नहीं, बल्कि गांव के खाली प्लाट में अभ्यास करती हैं। दुपट्टा हटाना भी आसान नहीं था, लेकिन परिवार का विश्वास जीतकर इन्होंने यह मुकाम हासिल किया है।

यूं जाने इनके संघर्ष की कहानियां

गुलपसा के पिता लकवे से पीड़ित है और परिवार की स्थिति बेहद कमजोर है। कोरोना काल में उनकी शादी की तैयारी हो रही थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। एनजीओ से जुड़कर पढ़ाई और खेल दोनों जारी रखे और आज आसपास की बेटियों को प्रेरित कर रही है। साहिला की कहानी भी संघर्ष भरी है।

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पिता का साया सिर से उठ चुका था और परिवार ने पढ़ाई छुड़वा दी थी। निकाह की बातें चल रही थी. लेकिन दो साल पहले उन्होंने फुटबाल पकड़ी और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब वे बतौर डिफेंडर टीम की अहम खिलाड़ी है।

अमनदीप सिंह

अमनदीप सिंह एक समर्पित और अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 10 वर्षों से मौसम और कृषि से संबंधित खबरों पर गहन और जानकारीपूर्ण लेख लिख रहे हैं। उनकी स्टोरीज़ मौसम के पूर्वानुमान, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और कृषि क्षेत्र की नवीनतम तकनीकों, योजनाओं और चुनौतियों को उजागर करती हैं, जो किसानों और ग्रामीण समुदायों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। अमनदीप का लेखन सरल, विश्वसनीय और पाठक-केंद्रित है, जो कृषि समुदाय को बेहतर निर्णय लेने में मदद करता है।

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