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पौष अमावस्या पर स्नान दान और दीपदान क्यों माना जाता है शुभ

On: December 18, 2025 8:03 PM
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पौष अमावस्या पर स्नान दान और दीपदान क्यों माना जाता है शुभ
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पौष अमावस्या 2025 हिंदू परंपरा में एक महत्वपूर्ण धार्मिक तिथि मानी जाती है। यह दिन सूर्य उपासना, पितृ स्मरण और भगवान विष्णु व शिव की पूजा से जुड़ा हुआ है। इस अवसर पर स्नान दान और तर्पण की परंपरा का उद्देश्य आध्यात्मिक शुद्धि और पारिवारिक संतुलन को मजबूत करना माना जाता है।

पौष अमावस्या क्यों मानी जाती है विशेष

पौष माह को धर्म ग्रंथों में सूर्य देव और पितरों को समर्पित बताया गया है। अमावस्या तिथि वैसे भी पितृ कर्मों के लिए उपयुक्त मानी जाती है, लेकिन पौष अमावस्या को इसका विस्तारित रूप माना जाता है।

धार्मिक विद्वानों के अनुसार इस दिन किया गया स्मरण और सेवा
• पितरों को शांति प्रदान करता है
• पारिवारिक बाधाओं को कम करता है
• मानसिक स्थिरता और आंतरिक संतुलन बढ़ाता है

स्नान दान और पूजा का महत्व

शुद्धि और संयम का दिन

पौष अमावस्या पर प्रातः स्नान को विशेष फलदायी माना गया है। ठंड के मौसम में स्नान आत्मसंयम और साधना का प्रतीक माना जाता है।

स्नान के बाद
• अन्न
• वस्त्र
• तिल
• आवश्यकता अनुसार धन

का दान करने की परंपरा है। माना जाता है कि यह दान पुण्य के साथ सामाजिक संतुलन को भी मजबूत करता है।

विष्णु और शिव पूजा का धार्मिक अर्थ

संतुलन और संरक्षण की उपासना

पौष अमावस्या पर भगवान विष्णु को पालन और संरक्षण का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है। वहीं भगवान शिव को संहार और पुनर्निर्माण की शक्ति के रूप में स्मरण किया जाता है।

पूजा के दौरान
• विष्णु और शिव की आरती
• मंत्र जप
• सात्विक वातावरण

को प्राथमिकता दी जाती है। विद्वानों का मानना है कि यह दिन जीवन में संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है।

भगवान विष्ण की आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।

भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

ॐ जय जगदीश हरे।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।

स्वामी दुःख विनसे मन का।

सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

ॐ जय जगदीश हरे।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।

स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।

तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥

ॐ जय जगदीश हरे।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।

स्वामी तुम अन्तर्यामी।

पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥

ॐ जय जगदीश हरे।

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।

स्वामी तुम पालन-कर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥

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ॐ जय जगदीश हरे।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

स्वामी सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥

ॐ जय जगदीश हरे।

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

स्वामी तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

ॐ जय जगदीश हरे।

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

स्वमी पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे।

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।

स्वामी जो कोई नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥

ॐ जय जगदीश हरे।

शिव जी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे ।

हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे ।

त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी ।

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चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ।

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलधारी ।

सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी ॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।

प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका ॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे ।

कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

पितृ तर्पण और दीपदान की परंपरा

पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता

पौष अमावस्या पर पितरों के लिए तर्पण किया जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि सूर्यास्त के बाद घर के दक्षिण दिशा में सरसों के तेल का दीपक जलाने से पितृ प्रसन्न होते हैं।

तर्पण के समय
• जल और तिल का प्रयोग
• पितरों का स्मरण
• सरल आरती या प्रार्थना

की जाती है। इसका उद्देश्य पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना होता है।

पितृ देव की आरती

जय जय पितर जी महाराज,

मैं शरण पड़ा तुम्हारी,

शरण पड़ा हूं तुम्हारी देवा,

रख लेना लाज हमारी,

जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

आप ही रक्षक आप ही दाता,

आप ही खेवनहारे,

मैं मूरख हूं कछु नहिं जानू,

आप ही हो रखवारे,

जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

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आप खड़े हैं हरदम हर घड़ी,

करने मेरी रखवारी,

हम सब जन हैं शरण आपकी,

है ये अरज गुजारी,

जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

देश और परदेश सब जगह,

आप ही करो सहाई,

काम पड़े पर नाम आपके,

लगे बहुत सुखदाई,

जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

भक्त सभी हैं शरण आपकी,

अपने सहित परिवार,

रक्षा करो आप ही सबकी,

रहूं मैं बारम्बार,

जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

जय जय पितर जी महाराज,

मैं शरण पड़ा हू तुम्हारी,

शरण पड़ा हूं तुम्हारी देवा,

रखियो लाज हमारी,

जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़ा तुम्हारी।।

आरती का महत्व क्या है

धार्मिक परंपरा में आरती को सामूहिक ऊर्जा का माध्यम माना गया है।
• विष्णु आरती जीवन में स्थिरता और विश्वास का भाव जगाती है
• शिव आरती आत्मबल और धैर्य को मजबूत करती है
• पितृ आरती स्मरण और आशीर्वाद की भावना को गहरा करती है

विशेषज्ञ मानते हैं कि आरती का भावात्मक पक्ष अधिक महत्वपूर्ण होता है, शब्द नहीं।

आज के समय में इसका क्या प्रभाव

आधुनिक जीवन में पौष अमावस्या जैसी तिथियां केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानसिक विराम और आत्मचिंतन का अवसर भी देती हैं। परिवार के साथ यह दिन बिताना और पूर्वजों को याद करना भावनात्मक संतुलन में सहायक माना जाता है।

आगे क्या करें

जो लोग विस्तृत पूजा नहीं कर सकते, वे
• पितरों का स्मरण
• जरूरतमंद की सहायता
• सात्विक भोजन और संयम

अपनाकर भी इस दिन का आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

मोनिका गुप्ता

मोनिका गुप्ता एक अनुभवी लेखिका हैं, जो पिछले 10 वर्षों से लाइफस्टाइल, एंटरटेनमेंट, ट्रेंडिंग टॉपिक्स और राशिफल पर हिंदी में आकर्षक और जानकारीपूर्ण लेख लिख रही हैं। उनकी रचनाएं पाठकों को दैनिक जीवन की सलाह, मनोरंजन की दुनिया की झलक, वर्तमान ट्रेंड्स की गहराई और ज्योतिषीय भविष्यवाणियों से जोड़ती हैं। मोनिका जी का लेखन सरल, रोचक और प्रासंगिक होता है, जो लाखों पाठकों को प्रेरित करता है। वे विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और न्यूज़ पोर्टल्स (Haryananewspost.com) पर सक्रिय हैं, जहाँ उनकी कलम से निकले लेख हमेशा चर्चा का विषय बन जाते हैं।

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