चंडीगढ़, 22 मई (हरियाणा न्यूज पोस्ट)। Sawan Somwar 2026 list: देशभर के शिव मंदिरों और कांवड़ मार्गों पर जल्द ही ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ की गूंज सुनाई देने वाली है। हिंदू पंचांग के अनुसार, साल का पांचवां और सबसे पवित्र महीना माना जाने वाला सावन (श्रावण) इस साल 30 जुलाई 2026 से शुरू होने जा रहा है। दृक पंचांग की गणना के मुताबिक, इस दिन सावन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि रहेगी। उत्तर प्रदेश के वाराणसी, हरिद्वार, दिल्ली-NCR और हरियाणा के शिवालयों में इस दिन से विशेष पूजा-अर्चना और जलाभिषेक का दौर शुरू हो जाएगा। आमतौर पर जुलाई और अगस्त के महीने में पड़ने वाला यह समय पूरी तरह शिव भक्ति के रंग में रंगा रहता है।
28 अगस्त को होगा समापन, इस बार पड़ेंगे 4 सोमवार
साल 2026 में सावन (Sawan) का महीना कुल 30 दिनों का रहने वाला है। इस पावन महीने का समापन 28 अगस्त 2026 को श्रावण पूर्णिमा के साथ होगा, जिस दिन रक्षाबंधन का त्योहार भी मनाया जाता है। सावन के महीने में सोमवार के व्रत का विशेष महत्व होता है। इस साल पंचांग के अनुसार सावन के महीने में कुल 4 सोमवार पड़ रहे हैं, जो इस प्रकार हैं:
पहला सावन सोमवार: 3 अगस्त 2026
दूसरा सावन सोमवार: 10 अगस्त 2026
तीसरा सावन सोमवार: 17 अगस्त 2026
चौथा सावन सोमवार: 24 अगस्त 2026
(नोट: स्रोत सामग्री में दी गई तिथियों में पंचांग गणना के अनुसार केवल सावन के भीतर आने वाले सोमवारों की क्रोनोलॉजी को स्पष्ट किया गया है।)
समुद्र मंथन से जुड़ा है सावन का रहस्य, क्यों कहलाए नीलकंठ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावन (Sawan) के महीने का भगवान शिव से संबंध सृष्टि को बचाने के लिए किए गए महान त्याग से जुड़ा है। पुराणों में वर्णित कथा के मुताबिक, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत की चाह में समुद्र मंथन किया था, तो उसमें से चौदह रत्न निकले थे। लेकिन इन रत्नों के साथ-साथ समुद्र से ‘हलाहल’ नामक एक अत्यंत घातक और विनाशकारी विष भी निकला था। इस विष की गर्मी और तीव्रता इतनी भयानक थी कि इससे पूरी सृष्टि नष्ट होने के कगार पर पहुंच गई थी। तब सभी देवताओं और असुरों ने इस महासंकट से उबरने के लिए भगवान शिव की शरण ली और उनसे रक्षा की प्रार्थना की।
विष की ज्वाला को शांत करने के लिए हुआ था जलाभिषेक
सृष्टि को तबाही से बचाने के लिए महादेव ने उस घातक विष को पीना स्वीकार किया। उन्होंने ब्रह्मांड की रक्षा के लिए विष को पूरी तरह निगलने के बजाय अपने कंठ (गले) में ही रोक लिया। विष के तीव्र प्रभाव के कारण भगवान शिव का कंठ पूरी तरह नीला पड़ गया, जिसके बाद से उन्हें ‘नीलकंठ’ के नाम से पूजा जाने लगा। यह ऐतिहासिक और पौराणिक घटना सावन के महीने में ही घटी थी। विष की भयंकर ज्वाला के कारण महादेव के शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया था और वे तपने लगे थे।
आज भी जारी है सदियों पुरानी परंपरा
भगवान शिव के शरीर के तापमान को कम करने और उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए सभी देवताओं ने उन पर लगातार गंगाजल और पवित्र नदियों का जल चढ़ाना शुरू किया। जल की धार से महादेव के शरीर की तपन शांत हुई और उन्हें राहत मिली। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, तभी से सावन (Sawan) के महीने में शिव जी को जल अर्पित करने यानी जलाभिषेक करने की यह परंपरा शुरू हुई जो आज भी बदस्तूर जारी है। यही वजह है कि सावन के महीने में करोड़ों भक्त कांवड़ में गंगाजल लेकर आते हैं और शिवरात्रि व सोमवार के दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाकर महादेव का आशीर्वाद लेते हैं।
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