Dairy Farming Pandharpuri Buffalo: Star of dairy farming, speciality of 1790 liters of milk!: पंढरपुरी भैंस (Pandharpuri Buffalo) महाराष्ट्र की एक अनमोल देसी नस्ल है, जो डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming) के लिए किसानों की पहली पसंद बन रही है। यह भैंस अपनी लंबी, घुमावदार सींगों और उच्च वसा युक्त दूध (Milk Fat) के लिए जानी जाती है।
एक ब्यांत में यह औसतन 1790 लीटर दूध देती है, जो इसे बाजार में खास बनाता है। सांगली, सोलापुर, और कोल्हापुर जैसे क्षेत्रों में यह नस्ल लोकप्रिय है। आइए, इस भैंस की खासियतों, पहचान, और पालन-पोषण की जानकारी लेते हैं।
पंढरपुरी भैंस की अनूठी पहचान Dairy Farming Pandharpuri Buffalo
पंढरपुरी भैंस (Pandharpuri Buffalo) का नाम सोलापुर के पंढरपुर से आता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसकी लंबी, घुमावदार सींगें, जो तीन प्रकार की होती हैं: भक्करड (पीछे और ऊपर मुड़ी), टोकी (बाहर की ओर घूमी), और मेरी (नीचे की ओर सीधी)। यह भैंस ज्यादातर काले रंग की होती है, लेकिन माथे, पैरों, और पूंछ पर सफेद निशान भी दिखते हैं।
इसका औसत कद 130 सेमी और वजन 416 किलोग्राम होता है। बछड़े का जन्म वजन 25.6 किलोग्राम होता है। यह नस्ल गर्म और शुष्क जलवायु में आसानी से ढल जाती है। यह विशेषता इसे डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming) के लिए आदर्श बनाती है।
दूध उत्पादन और गुणवत्ता
पंढरपुरी भैंस का दूध उत्पादन (Milk Production) इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह एक ब्यांत में औसतन 1790.6 लीटर दूध देती है। इसके दूध में वसा की मात्रा (Milk Fat) 8.01% होती है, जो डेयरी उत्पादों के लिए बेहद फायदेमंद है। इसकी वजह से बाजार में इसका दूध अच्छे दामों पर बिकता है।
किसान इस भैंस का दूध ग्राहकों के सामने निकालते हैं। यह प्रक्रिया 30-40 मिनट लेती है और ताजगी का भरोसा देती है। यह नस्ल मध्यम दूध उत्पादन के साथ उच्च गुणवत्ता प्रदान करती है। यह डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming) में मुनाफा बढ़ाने में मदद करती है।
पालन-पोषण और देखभाल
पंढरपुरी भैंस का पालन-पोषण जोशी और गवली जैसे परंपरागत पशुपालक करते हैं। यह नस्ल इंटेंसिव सिस्टम में पाली जाती है, जिसमें नियंत्रित चारा (Concentrate Mixture) दिया जाता है। इन भैंसों को फसल अवशेष, हरा चारा, गेहूं की भूसी, मक्का, और सरसों की खली खिलाई जाती है।
दूध देने से पहले इन्हें अच्छा चारा दिया जाता है ताकि वे शांत रहें। यह नस्ल कम संसाधनों में भी अच्छा प्रदर्शन करती है। किसानों को सलाह है कि नियमित स्वास्थ्य जांच और उचित देखभाल से इसकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।













